पटना/नयी दिल्ली।
अद्भुत प्रतिभा के धनी रहे गणितज्ञ डा.वशिष्ठ नारायण सिंह के जन्म दिन पर उनके बारे में ....................................................................................................... राजनीतिक खबरों की भरमार के बीच ‘प्रभात खबर’ ने डा.वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में आज नई पीढ़ी को अच्छी अच्छी-खासी जानकारी दी है। हमलोग तो अद्भुत प्रतिभा के धनी गणितज्ञ वशिष्ठ बाबू के जमाने के छात्र थे और उनसे मिले बिना भी उनसे प्रेरित होते थे। उनके लिए पटना विश्व विद्यालय ने पहली बार नियम बदल कर जल्दी -जल्दी उन्हंे एम.एससी.करवा दी थी। उन्होंने 1963 में हायर सेकेंड्री परीक्षा पास की थी।नेतरहाट स्कूल में पढ़ेे वशिष्ठ जी बिहार टाॅपर थे। पर जब पटना साइंस काॅलेज में दाखिला लिया तो शिक्षकों ने पाया कि ये तो ऊंची कक्षाओं के विषयों में भी पारंगत हैं। फिर इनको एम.एससी.कराने के लिए 5 साल का लंबा समय क्यों लगाया जाए।वे 1965 में ही एम.एससी.कर गए।1969 में तो उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पीएच.डी.कर ली। उन्होंने कुछ समय के लिए नासा के लिए भी काम किया। पर कुछ ही साल बाद उनके दिमाग के तंतु उलझ गए यानी वे सिजोफं्रेनिया के मरीज हो गए। जिनके ज्ञान से नासा ने अंतरिक्ष मिशन को आगे बढ़ाया,वह अपने गांव में वर्षों से गुमनामी में जी रहे थे कि इस बीच ‘नोवा’ ने उनके पटना में रहने की व्यवस्था कर दी। नोवा के सहयोग से उनकी समय- समय पर स्वास्थ्य जांच भी होती रहती है।बीमारी से ग्रस्त इस जीनियस के सरकार बहुत काम नहीं आई,पर नोवा ने अपना मित्र धर्म निभाया। नोवा यानी नेतरहाट के पूर्ववर्ती छात्रों का संगठन।इसके सदस्य बड़े -बड़े पदों पर रहे हैं। यह नोवा भी एक अलग ढंग का संगठन है।इसके सदस्य ही ऐसे हैं। हाल में पटना में अवस्थित नोवा काॅलोनी जाने का अवसर मिला।उस सुव्यवस्थित काॅलोनी को देख कर उसके सदस्यों के व्यवस्थित व सुरूचिपूर्ण व्यक्तित्व की भी हल्की झलक मिली। बात उस समय की है जब मेरे पत्रकार मित्र इंद्रजीत प्रसाद सिंह पटना के दीघा-आशियाना रोड स्थित एक फ्लैट में रहते थे। उन दिनों यानी नब्बे के दशक में मैं लोहिया नगर में रहता था।वहां से आशियाना रोड की दूरी बहुत है।उधर अभी पूरी आबादी भी नहीं बसी थी। मैंने उनसे पूछा कि ‘ इतनी दूर क्यों आ गए ? आपको शहर में आवास नहीं मिला ?’ उन्होंने बताया कि ‘मेरे मित्र अजय जी का यह फ्लैट है।वे मुझसे किराया नहीं लेते।उनके ही आॅफर पर मैं यहां हूं।’ वे दोनों नेतरहाट स्कूल में साथ पढ़ते थे। अजय जी पटना के मशहूर यूरोलाॅजिस्ट हैं।दोस्तपरस्त हैं।कुछ तो उनका पारिवारिक संस्कार है । बाकी नेतरहाट की मैत्री संस्कृति । वह मैत्री संस्कृति वशिष्ठ बाबू के मामले में भी ‘नेतरहाटियनों’ ने कायम रखी।अब तो नेतरहाट झारखंड में है। उम्मीद है कि वहां के छात्रों के बीच पहले जैसी ही आपसी सद्भावना अब भी होगी। याद रहे कि आजादी के तत्काल बाद स्थापित नेतरहाट के छात्र बोर्ड परीक्षा में दर्जनों बार राज्य टाॅपर हुए।खैर अब तो शिक्षा-परीक्षा की जो हालत पूरे देश की है,वही बिहार की भी है। खुदा खैर करे !!...


नई दिल्ली/जयपुर।
# पत्रकारिता का एक अनुभव यह भी एक मित्र लेखिका ने अपना एक आलेख अपनी वाल पर शेयर किया। वहां एक विद्वान वामी साथी की प्रतिक्रिया थी - "बढ़िया आलेख है, पर क्या जम्मू-काश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम की जनता से कोई बातचीत की थी आपने? इन्टरनेट पर सर्च किया था कि कहां-कहां सेना ने दया दिखाई महिलाओं पर? इस तरह के आलेख भावुक होकर नहीं शोध करके लिखे जाएं, तो ज्यादा प्रमाणिक होंगे।" (विद्वान वामी ने कश्मीर को 'काश्मीर' और प्रामाणिक को 'प्रमाणिक' ही लिखा था, अतः इसे कृपया मेरा अज्ञान नहीं मान लें। मैंने बस, जस का तस रहने दिया है।) बात पते की है, लेकिन आलेख एक बचकाने भाषण के प्रतिवाद में लिखा गया था, अतः जो सबके सामने है, वही वर्णन उसमें था। प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया में पूछा जा सकता है कि भाषणबाज़ ने क्या सीमाओं को कभी देखा है, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम में तैनात सैनिकों से बात की है। वे वहां किन परिस्थितियों में रहते हैं, कभी यह जानने की कोशिश की है? लेकिन जाने दीजिए, इसलिए कि भाषण का मंतव्य जो था, उसके लिए इस गहन शोध की नहीं, एक विशेष नज़रिए की आवश्यकता है। ठीक उसी तरह एक अख़बारी आलेख और एकेडमिक शोध में भी अंतर है। मेरे ख़याल से विद्वान साथी से समझने में यही चूक हुई और यह चूक कोई नादानी में नहीं हुई थी, एक सोची-समझी शातिराना चाल के साथ जान-बूझ कर की गई थी, इस पर मैं सुनिश्चित हूं। ख़ैर, लेकिन इससे मुझे एक बहुत पुरानी घटना स्मरण हो आई। 'जनसत्ता' शुरू होने वाला था। विज्ञापन देख कर मैंने भी उप संपादक पद के लिए आवेदन भेज दिया। आवेदन के साथ एक से डेढ़ हज़ार शब्दों का एक आलेख किसी भी करेंट टॉपिक पर मांगा गया था। तब 'असम समस्या' चरम पर थी, अतः इसी विषय पर तक़रीबन चौदह सौ शब्दों का एक आलेख लिख कर मैंने अपने परिचय के साथ संलग्न कर दिया था। कुछ समय बाद साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया। मैं दिल्ली पहुंचा। गेट पर ही एक सरदार जी के दर्शन हुए। मैंने उनसे पूछ लिया कि इंटरव्यू किस तरफ़ चल रहे हैं। बस, ग़ज़ब हो गया। अब मेरे सामने अज़ब तमाशा था। उनका श्रीमुख ऐसे खुला, जैसे किसी बोलने वाली मशीन का बटन दब गया हो और गलती से उसकी स्पीड कई गुना कर दी गई हो। उनके दोनों हाथ बोलने की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, सारा शरीर थिरक रहा था या कहें कि वे उछल-कूद रहे थे और मैं हक्का-बक्का उन्हें देख रहा था। संभवतः वे मुझे अपना अंग्रेज़ी ज्ञान जता रहे थे, लेकिन मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। इस तरह तो अगर कोई हिन्दी बोले, तो वह भी समझी न जाए। मैंने कुछ देर सहन किया, फिर जोर से कहा - 'हप्प', और बिना यह देखे कि उनकी गति क्या हुई, आगे बढ़ गया। निश्चय ही वे भी मेरी तरह ही हक्का-बक्का हुए कुछ देर तो खड़े रहे ही होंगे, क्योंकि सभी हमारी ओर ही देख रहे थे। उनमें से कुछ बेसाख़्ता हंस दिए और कुछ मुस्करा उठे। कुछ ही देर में मैं ठिकाने पर पहुंच गया और बुलावा आने पर साक्षात्कार कक्ष में प्रवेश किया। यह दूसरा मौक़ा था, जब एक बार फिर हक्का-बक्का होना पड़ा। लगा जैसे गलती से मैं बॉलीवुड के किसी विलेन के अड्डे पर आ गया हूं। कमरे में घुप्प अन्धेरा था। दिखाई दिया कि लगभग दस फीट दूर एक धीमी रोशनी का बल्ब काफी नीचे लटका हुआ था। उसके ठीक नीचे एक कुर्सी रखी थी। बाक़ी क्या है, कुछ है भी या नहीं, यह अंधेरे में खोया हुआ था। किसी कुएं से आती लगी एक आवाज़ ने कुर्सी पर बैठने का हुक्म दिया और इंटरव्यू शुरू हुआ। आवाज़ों के अंतर से स्पष्ट हो गया कि वहां कई लोग मौजूद थे। बाक़ी सब तो जाने दें, क्योंकि मुझे अनुमान हो गया था कि अपना सलेक्शन होगा नहीं, अतः मैं खीझ में था और उस घुटन से शीघ्र बाहर आना चाहता था। उनमें से एक सज्जन ने मुझे यह मौक़ा दे दिया। पूछा - "आपने आलेख अच्छा लिखा है? क्या कभी असम गए थे। कैसे लिखा?" मैंने कहा - "यह तो रेफ़रेंसेज से लिखा गया है।" अब वे व्यंग्यात्मक स्वर में बोले - "ओह, तो आप रेफ़रेंसेज से लिखते हैं।" मैंने अंधेरे में आंखें गढ़ा दीं और ठीक उसी सुर में बोला - "आप जो दुनियाभर, उसके लोगों और उनकी समस्याओं पर लिखते हैं, क्या सभी जगह गए हैं? सब से मिले हैं?" "सवाल नहीं, सवाल हम पूछेंगे," उधर से आवाज़ आई। मैं उठ खड़ा हुआ। दोनों हाथ जोड़े। कहा - "नमस्कार," ... और चला आया। मेरे बाहर निकलने तक अंधेरे से खुसर-पुसर की ध्वनि शुरू हो चुकी थी। आज मैं सोचता हूं कि अच्छा हुआ कि मेरी नियुक्ति वहां नहीं हुई, वरना संभव है कि मैं भी इन दिनों सोशल मीडिया में सक्रिय वहां के कुख्यात 'ब्लॉकबाज़ दलाल' के प्रतिरूप में तब्दील हो चुका होता। 🤔 --------------------------------- यह स्मृति लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखी गई थी। तब इसमें महिला मित्र और विद्वान साथी के शुभनाम भी थे, लेकिन अब दोनों ही मुझे अनफ्रेंड कर गए हैं, अतः इस टिप्पणी को उसी रूप में पुनर्प्रस्तुत करना मुझे उचित नहीं लगा। इसलिए मैंने इसे कुछ संशोधित कर दिया और शेयर करने के बजाय यह एक नए रूप में आपके सामने है। रसास्वादन कीजिए।...


भारत/नई दिल्ली/जम्मू कश्मीर ।
वरिष्ठ निर्वासित कश्मीरी साहित्यकार अमर मालमोही से एक भेंट सहसा -अग्निशेखर बरसों बाद एक विवाह समारोह में यहाँ जम्मू में वरिष्ठ कश्मीरी और उर्दू के नाटककार,कहानीकार, उपन्यासकार और चिन्तक प्रोफेसर अमर मालमोही से भेंट हुईं । कश्मीर से निर्वासन के बाद कुछ वर्ष जम्मू में बदहाली का शरणार्थी जीवन जीने के बाद पुणे जाकर बेटे के पास रहने को बाध्य हुए। यह अधिकांश कश्मीरी विस्थापितों का बच्चों की आर्थिक बाध्यताओं के चलते दूसरा विस्थापन है जिसके चलते वे देश के सुदूर राज्यों में और ज़्यादा छितरा गये। प्रो. अमर मालमोही की यह भी एक विडंबना है कि इनके बड़े सुपुत्र दिव्यांग हैं और इन्हें एक माँ की तरह उनका हरदम खयाल ही नहीं रखना होता है,बल्कि अपने साए की तरह नित्य अपने साथ रखना पड़ता है। जहाँ जाते हैं साथ ले चलते हैं। उचाट अकेलेपन में उसे पीछे किसके पास छोड़कर जाएँ वो भी किराए के मकान में! कश्मीर की बात अलग थी।अपना घर था। मालमोह गाँव था ,अडोस पडोस अपना था। फिर यह बच्चा छोटा भी तो था।संयुक्त घर में देखभाल थी।पत्नी थीं, माँ थीं । भाई और भौजाइयां थीं । हर एक कश्मीरी विस्थापित की तरह प्रो.अमर मालमोही की भी अपनी एक दुनिया थी । संबंधों का एक स्वायत्त गणतंत्र था जिसमें कश्मीरी,उर्दू,हिंदी और अंग्रेज़ी के उनके दर्जनों साहित्यिक मित्र थे,रंगकर्मी थे । एक ज़िन्दादिली थी। विचार-विनिमय और बहसें थीं शादी-ब्याह,मेले-ठेले,तीज-त्यौहार, खेत खलिहान थे। और एक दिन उनकी दुनिया भी बदल गयी। अडोस पडोस बदल सा गया। यार दोस्त,कालेज के सहकर्मी बदल से गये।आज जब पलटकर याद करते हैं तो चीज़ें साफ दिखाई देती हैं,"तब हमने उस पूरी प्रोसेस को समझने में कोताही की। यकीन न किया कि ऐसा भी हो सकता है हमारे साथ।हालांकि हमारी सामूहिक जलावतनी से पहले हवा पगलाई जा रही थी और हम थे कि शायद समझकर भी मानना ही न चाह रहे थे।" अमर मालमोही चूंकि एक प्राध्यापक और प्रसिद्ध साहित्यकार थे,इसलिए एक रुतबा था।याद करते हैं कि कैसे उनका पूरा गांव खाली हो गया था और वह गाँव में ही टिके रहे।आखिरी कश्मीरी पंडित घर के रूप में चिन्हित होने तक। उनकी माताश्री उनसे भी बढकर बंधी थीं अपने गाँव मालमोह से,अपने घर से।एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था घर।यहाँ तक कि जब अमर मालमोही ने बेबसी, दहशत और हत्या की करीब आती आशंका के चलते गाँव छोडने का फैसला किया तो उनकी माताश्री वहीं अकेले रहने की बेतुकी ज़िद्द पर अड गयीं। जान पर बन आई थी अमर मालमोही के,क्या करते! प्रो.अमर मालमोही को अनिष्ट का पूर्वाभास तो था, और यह पूर्वाभास कहानीकार हरिकृष्ण कौल ,कवि मोहन निराश आदि उनके कई समकालीनों की रचनाओं में भी दबे स्वर में कब से अभिव्यक्ति पा रहा था,इसलिए वह अपने गाँव से 40-45 किलोमीटर दूर सोपोर डिग्री कालेज आते जाते बस में परिचितों के साथ भी कोई बात न करते। एक दिन इशारों में उनके एक सहयोगी ने कालेज में उनसे कहा भी कि हालात दिनों दिन खराब ही हुए जा रहे हैं,अपना "खास" खयाल रखिये । गाँव में भी ऐसी ही सूँघ ने उन्हें बेचैन कर दिया था।पूरी घाटी से अधिकांश हिन्दू घरबार छोड़ कर भाग गये थे। उनका अपना दिल नहीं मान रहा था।जैसे दिल नहीं, उनकी ज़िद्दी माँ हो। अमर मालमोही अब सोपोर कालेज से गाँव न लौटकर सीधे गनपतयार ( श्रीनगर) अपने मौसेरे भाई दया कृष्ण कौल के पास चले जाते।रात वहाँ रहकर सुबह बटमालू बस-अड्डे से लगभग 45 किलोमीटर दूर सोपोर चले जाते। अब तक श्रीनगर भी धीरे धीरे कश्मीरी हिन्दुओं से खाली हो चुका था।याद करते हैं ,"एक दिन सोपोर के सब डिविजन मजिस्ट्रेट ने मुझे लिखित अनुदेश भेजा कि आपको सोपोर का मजिस्ट्रेट बनाया गया है ।यह खबर मेरी आतंकवादियों के हाथों मारे जाने की एक डैथ-वारंट के समान थी।अब वे मुझे क्यों छोड़ते! मैंने घबराकर एस. डी. एम. के कार्यालय जाकर वहाँ आवेदन दिया कि मैं अपने विकलांग बच्चे और बूढ़ी मां के कारण इस ज़िम्मेदार को निभाने में असमर्थ हूँ ।" उन दिनों को याद करते हुए अमर मालमोही की आवाज़ में आज भी कंपकंपी महसूस की जा सकती है। एक दिन कालेज से लौटते हुए सोपोर बस-अड्डे की ओर जा रहे थे ।रास्ते में कुछ हरी सब्जियां खरीदीं थीं जो एक थैले में डाल रखीं थीं ।उन्हें उसी दिन वेतन भी मिला था। असुरक्षा की भावना का आलम यह था कि उन्होंने सब्जी के थैले में ही पूरी तन्ख्वाह छिपाकर रखी थी। " सर,अस्सलामुअलैकुम ! " उन्होंने पलटकर देखा।एक फिरन पहने नव युवक उनके पीछे पीछे आ रहा था।उन्होंने आगन्तुक के अभिवादन का स्वागत किया । "सर,आपने मुझे पहचाना नहीं ।मैं आपका स्टूडेंट हूँ ।पढ़ाया है आपने मुझे!" पीछे पीछे आ रहा नवयुवक अब उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगा ।देखते ही देखते दूसरा नव युवक भी मेरी बाईं तरफ प्रकट हुआ। " सर, क्या आप यह चाहेंगे कि आप यहाँ सोपोर की सड़कों पर अपने ही स्टूडेंट्स का लहू बहाएँ ?" उस नव युवक ने प्रो.अमर मालमोही से ऐसा कहकर उनके होश उडा दिए । उन्होंने घबराई लेकिन संयत दिखने वाली आवाज़ में उस लड़के से बात को साफगोई से बताने को कहा। दिल की धडकनें तेज़ हो गयीं थीं। उन्हें ऐसी कई घटनाएं याद हो आईं जब आतंकवादियों ने अपनों से ही अपनों की हत्याएँ करवायीं थीं । "हमने सुना है कि आपको सरकार ने मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए हैं। हम जब पुलिस और भारतीय फौजों से लड़ाई कर रहे होंगे तो वे आपसे गोली चलाने का आदेश माँगेंगे।और उनकी गोलियों से हम मरेंगे,आपके शागिर्द ।" अमर मालमोही समझ गये थे कि उनके ये विद्यार्थी कौन हैं ।इससे पहले कि वह उस नवयुवक की बात का जवाब देते, उसके हाथ से सब्जी का थैला लेकर उस नवयुवक ने अपने दूसरे साथ को थमाते हुए निर्देश दिया ," जा, तुम प्रोफेसर साहब के लिए श्रीनगर की बस में फ्रंट सीट की टिकट खरीद कर रखो,हम आते हैं ।" अमर मालमोही बताते हैं कि उस एक पल सहसा मुझे अपनी जान से ज़्यादा चिन्ता सब्जी के थैले में छिपा कर रखे वेतन की हुई। मैं कैसा मूर्ख था ! बस अड्डे की ओर डग भरते हुए अमर मालमोही को उस नवयुवक ने धीरे से कहा," आप कुछ दिनों के लिए छुट्टी ले सकते हैं ...." याद करते हैं अमर मालमोही कि जब उन्हें बस में ड्राइवर की बगल में फ्रंट सीट पर उन दो नव युवकों ने सम्मान से बिठाया।मुझे किराया नहीं देने की बात कहकर मुझे विदा करते हुए 'अलविदा!' कहा । बस जब अड्डे से बाहर मुख्य राजमार्ग पर दौड़ने लगी तो बस के ड्राइवर ने ऊँची आवाज़ में मेरा शुक्रिया अदा करते हुए कहा, " पंडित जी,आपकी बदौलत हमें इन जाँबाज़ मुजाहिदों के दीदार नसीब हुए। दीन के लिए निकले हैं । " अमर मालमोही के आज भी सिहरन दौड़ती है । वह कहते हैं ,ऐसे दहशत भरे दिनों में सार्वजनिक तौर पर कोई नहीं चाहता था कि उसे हिंदू के रूप में पहचाना जाए। यह दुर्भाग्य के वो दिन थे जब मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते कि कि राह चलते कोई आपसे 'नमस्ते ' न कहें और लोगों को पता चले कि आप हिंदू हैं । प्रो.अमर मालमोही के मौसेरी भाई, जिनके यहाँ सोपोर कालेज से रोज़ रोज़ श्रीनगर जाकर वह रहने लगे थे,दया कृष्ण कौल उनसे जुड़ी एक यह घटना सुनाते हैं ," एक दिन दोपहर में हमारे किराए के मकान के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। दस्तक किसी अजनबी की थी।लोग उन दिनों दस्तकों से खूब दहशत में आते थे ।" अमर मालमोही भाई की बात को ध्यान से सुनते हुए हामी में सर हिलाते हैं । दया कृष्ण कौल आगे कहते हैं, " मैंने दरवाज़ा खोला।सामने एक छः फुटा बीस-बाईस वर्ष का एक युवक था।यहाँ कोई प्रोफेसर रहता है,उसने पूछा ।मेरे होशोहवास उड गये। मैंने 'नहीं' कहने में अंदर से बहुत ज़ोर लगाया।उसने यही सवाल बार बार दोहराया ।मेरे पूछने पर उसने एक कृत्रिम सी वजह बताई कि वह उनसे ट्यूशन पढ़ने चाहता है ..फिर वह थोड़ी देर के बाद चला गया।" दया कृष्ण कौल को सारा खेल समझ में आया।प्रो.अमर मालमोही की पूरी जानकारी आतंकियों ने जुटा ली है।वह चार- साढे चार बजे सोपोर से श्रीनगर पहुँचते हैं। उन्होंने विवेक से काम लिया और घर (गनपतयार में) पहुँचने से पहले ही उन्होंने अमर मालमोही को रास्ते में ही रोककर उनसे यह बात बताई । ऐसा सुनने पर अमर मालमोही ने फट् से कहा था ," गाशा,शायद उसी नवजवान ने मुझे हब्बाकदल (पुल)पर अभी रोककर यही बात कही थी कि वह मुझसे ट्यूशन पढ़ना चाहता है।मैं हैरान था कि एक अजनबी से वह सीधे यह कैसे कह रहा था।" अमर मालमोही को वहीं से लौटाया भाई ने।वह जोखिम उठाकर गांव पहुँचा उलटे पाँव ।उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है । क्यों यह साम्प्रदायिक नारे दिए जा रहे हैं ..क्यों कश्मीरी पंडितों को डराया धमकाया जा रहा है..क्यों उन्हें भगाने पर तुले गये हैं ये लोग..और शाइस्ता लोग इसका विरोध क्यों नहीं कर रहे..क्यों कोई अपील नहीं करता कि अल्पसंख्यक हिंदुओं को टारगेट न किया जाय... उन्हें एक दिन अपने एक पडोसी मुस्लिम दोस्त ने अपनी ट्रक पर चढ़ाकर दूर तक सैर कराई थी।उसकी बातों से अमर मालमोही को अंदर के उबाल की कुछ भनक लगी थी।उनके इस दोस्त का एक भाई तरीके हुर्रियत का वरिष्ठ सदस्य था।इसलिए उसकी बात का मूल्य था। अमर मालमोही ने माताश्री से एकबार फिर विनती की कि वह चले जम्मू उसके साथ ।वह कहाँ मानने वाली थी! अचानक दो लोग घर चले आए और प्रोफेसर अमर मालमोही को हाथ में सिगरेट की डिब्बिया के कागज़ की एक पर्ची थमा कर चले गये। यह उनके इसी ड्राइवर दोस्त की उन्हें भेजी एक पर्ची थी,जिसपर लिखा था,जाना चाहो तो गाडी का इंतज़ाम भी हो जाएगा । किसी तरह जान हथेली पर रखकर अमर मालमोही जम्मू पहुँचे थे। भाई और बच्चे तो पहले ही जम्मू भाग आए थे।यहाँ परेड ग्राउंड के पास गीता-भवन के अहाते में निर्वासित लोगों का रेलमपेल था।पंजीकरण, राहत, तंबुओं का जुगाड़, जुलूस और जलसे इत्यादि के बीच अपनों से भी मिलना हो जाता। कुछ दिनों के बाद कश्मीर से फोन आया था अमर मालमोही को कि गाँव में आपकी अकेली माँ का इंतकाल हो गया है। अमर मालमोही कुछ रिश्तेदारों को साथ लेकर मालमोह गाँव पहुँचे तो उन्हें यह देखकर निहायत अफसोस हुआ कि गाँव भर में न उनका लौटना कोई घटना थी और न ही औपचारिकता वश भी कोई उनकी माँ के दाह-संस्कारा में शामिल हुआ। यह वो गाँव न था जहाँ वह सदियों से रहते आए थे।उन्होंने जाकर पटना तहसील की पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी लिखाने की असफल कोशिश की। वह आज भी हैरान है कि उनकी माताश्री की मृत्यु को सामान्य कहा जाए या और कुछ ... अमर मालमोही अपने सुपुत्र को साथ रिश्ते की अपनी एक बहन के बेटे के यज्ञोपवीत समारोह में शामिल होने के सिलसिले में जम्मू आए थे। उन्होंने देर तक मुझसे हमारे साझा साहित्यिक मित्रों के बारे में जानकारियाँ जुटाईं। # #...


मुंबई/काशी।
अपना बना लो ... मेरे कई दोस्त जो हमारे महामिलन के बारे में नहीं जानते, कहते हैं ये क्या बकवास लिखते हो रोज रोज ? वैसे तो तुम्हारे पास फोन उठाने का वक्त नहीं रहता लेकिन इतना लिखने के लिए वक्त कहाँ से आ जाता है ? आज उनके लिए बस इतना ही कहना चाहता हूँ की हमारे फेसबुक के कुछ मित्रगण भोपाल मे 16 दिसम्बर को एक मिलन समारोह आयोजित किये हैं, मै भी उसमे शामिल हूँ और उसी के बारे में लिखता रहता हूँ l लेकिन मै क्यों लिखता हूँ इसकी कई वज़ह है, आइये आज आपको एक वजह से मिलाता हूँ l ******* बात लगभग 40-42 वर्ष पुरानी है, उस वक्त मुंबई में रहने की बहुत दिक्कत होती थी l हम लोग खुशनसीब थे की दादाजी को सांताक्रूझ में फ़्लैट अलॉट किया था l दादाजी और मै, बस दो ही रहने वाले l मै छोटा था और दादाजी को ड्यूटी जाना होता था l हमारे पडोसी ने सुझाव दिया किरायेदार रख लो, किराया भी मिलेगा, बच्चे की देखभाल भी हो जायेगी l बात जंची लेकिन किरायेदार ऐसा होना चाहिए जो घर का लगे, नही तो शिकायत हो जाने पर रूम खाली करना पड़ता l एक लोग मिले तबलावादक थे, संघर्ष के दौर में थे l दिनभर अपनी ही रोजी रोटी की जुगाड़ में रहते, न मुझे देख पाते न किराया दे पाते l लेकिन दादाजी का पैर दिन भर में बीस बार छूते, कहते आप मेरे पिता समान हो l फिर उन्होंने अपने एक और मित्र जो हारमोनियम बजाने के साथ साथ गाते भी थे, उन्हें ले आये l ऐसे ही कई लोग आते गए, दादाजी को पिता और मुझे भतीजा बनाते गए l लेकिन किराया किसी ने नहीं दिया l अक्सर खाना भी दादाजी का ही खाया और वक्त जरूरत उधार भी लिया l बस इतना अच्छा हो गया था की अब कोई सामान बाज़ार से दादाजी को नहीं लाना होता, न ही उन्हें खाना बनाना होता l ये सभी लोग फिल्म के ही किसी न किसी विधा से जुड़े थे और कमोबेश सभी संधर्षरत ही थे l लेकिन इन लोगो से मेरा फायदा हो जाता l शूटिंग और हीरो हिरोइन को देखने व कभी कभी उनसे मिलने का मौका भी मिल जाता था l ******** फिर आये "संतोष व्यास" l ये उज्जैन से आये थे और फिल्मो में लिखना चाहते थे l लेकिन मौका नहीं मिल रहा था l रोज अपनी कहानी लेकर जाते और थकहार वापस आ जाते l दादाजी की इन्ही से सबसे ज्यादा जमती थी l शायद इसलिए की ये बुद्धिमान भी थे और गम्भीर भी l ये लेखक थे और दादाजी को भी कविताएं लिखने का शौक था l संघर्षो का कभी तो अंत होता ही है और हुआ भी l व्यास जी की मुलाक़ात हुई "सुलतान अहमद" से l उन्हें कहानी पसंद आई और उस कहानी पर फिल्म बनी " गंगा की सौगंध " जिसमे महानायक अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था l उस वक्त व्यास जी का पारश्रमिक तय हुआ था 25000 रुपये l साइनिग अमाउंट न के बराबर मिला था l फिल्म की रिलीज के बाद मिले पैसों से व्यास जी, मिठाई और कई महीने का किराया लिफ़ाफ़े में भर कर लाये थे l मुझे याद है वो लिफाफा देते वक्त उनके हाँथ काँप रहे थे और आँखों से झर झर आंसू गिर रहे थे l वो बार बार दादाजी का पैर छू रहे थे l दादाजी ने लिफाफा लेकर मेज पर रख दिया, उनके कंधो पर हाँथ रख कर सोफे पर बिठाते हुए बोले " किराया मकान का होता है घर का नहीं l तुम मुझे पिता मानते हो तो ये तुम्हारा घर हुआ और घरो में घर वाले रहते है किरायेदार नहीं " l फिल्म हिट हो गयी थी, फिल्म की सिल्वर जुबली पार्टी में मुझे भी जाने का मौका मिला था ,"सुलतान अहमद" बड़े दानिशमंद निकले उन्होंने रुपये 25000 अतिरिक्त दिए व्यास जी को l उसी दिन उन्हें एक और कहानी लिखने को मिली, बाद में उसी कहानी पर शत्रुध्न सिन्हा अभिनीत "ज्वाला" फिल्म बनी l ******* लेकिन मुझे कहानी फिल्मो की नहीं व्यास जी की सुनानी थी l मै भूलता नहीं हूँ की कैसे उन्हें मुंबई की फिल्मो की दुनिया बहुत रास नहीं आई l फिल्म बनाना और बेचना भी एक पेशा है हर पेशे में कुछ अच्छी और कुछ बुरी बात भी होती है l व्यास जी की कहानी पर एक और फिल्म जीतेंद्र और रेखा के साथ "अपना बना लो" बनी l उस समय अमिताभ जी के फिल्म 'लावारिस' का एक गाना "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है" धूम मचाये हुए था l उस गाने को टक्कर देने के लिए फिल्म "अपना बना लो" की कहानी को थोड़ा ढीला करते हुए एक गाना डाला गया, "अपने अपने मियां पर सबको बड़ा नाज है" l व्यास जी को फिल्म की कहानी से छेड़छाड़ और इस गाने की वल्गैरिटी दोनों से बहुत था एतराज था और कुछ वादे के मुताबिक पैसे भी कम मिले l व्यास जी दुखी हो गये थे l दादाजी भी रिटायर होकर गांव चले आए थे l व्यास जी अब दूसरी जगह रहने लगे थे जो उन्हें बहुत पसंद नहीं थी l उन्हे अपने आपको साबित करना था वो उन्होंने कर दिया था l उनका दिल तो उज्जैन में बसता था l वो अपने घर एक मंदिर बनवाना चाहते थे l उनकी दिली तमन्ना थी की उस मंदिर में दर्शन करने दादाजी जरूर आएं l पर हम सब तो समय की बिसात पर बिछे मोहरे है l दादाजी और व्यास जी का मिलन फिर नहीं हो पाया l दादाजी रहे नहीं , व्यास जी का अता पता मुझे मालुम नहीं l लेकिन दादाजी की इच्छा जरूर थी उज्जैन जाने की, व्यास जी से मिलने की l मै दादाजी की इच्छा तो पूरी नहीं कर पाया पर तलाशता जरूर हूँ व्यास जी को हर उस शख्स मे जिसे दौलत शोहरत से ज्यादा अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपनी जमीन और अपनी मिट्टी से प्यार है l मै चाहता हूं दादाजी और व्यास जी का वह संबंध जिसमें भावनाओं का मोल था, पैसा तो बंद लिफाफे में तिरस्कृत सा टेबल पर पड़ा था l मुझे तलाश है उन रिश्तो की जो गले मिले और आंसुओ से कहे, घर में घरवाले रहते है किरायेदार तो मकानो में रहते हैं l...


अलीगढ़/उत्तरप्रदेश ।
#अनहाइजनिक_और_मोटीसंवेदना AMU के कुछ छात्रों (सोमवीर व अन्य )ने आरोप लगाया है कि सरसैयद अहमद साउथ हाल में चलने वाली कैंटीन में शाकाहारी खाना उसी बचे तेल में पकाकर छात्रों को खिलाया जा रहा है जिस तेल में नानवेज पकाया जाता है ।विवि प्रशासन को लिखे पत्र में छात्रों ने ज़िम्मेदार लोगों पर कार्यवाही की माँग की है।परंतु विवि प्रशासन बिना जाँच पड़ताल के ही आरोपों को ख़ारिज कर रहा है। आइए AMU कैंटीन की बुरी हालत पर ख़ुद मैं अपनी आखों देखी बताता हूँ।२००९-१० की बात है निजी कार्य से मैं दो हप्ते के अलीगढ़ प्रवास पर था।तो ख़ाली होते कहीं कुछ देखने की इच्छा पूरी करलेता था।तो एक-दो दिन AMU भी गया।कैंपस का भव्य प्रवेश द्वार और साफ़सुथरी सड़क -बढ़िया स्थापत्य और हरियाली के दृश्य अच्छे लगे।पूरा घूमते हुए सड़क से आर पार हो आए।फिर मन किया कैंटीन दिखी और चाय की तलब जगी। तो कैंटीन बिल्डिंग में घुस गया।हाल में पहुँचते ही नानवेज की गंध का ज़ोर का भभका नथुनों से टकराया।निगाहे घुमायी तो दो तीन बड़े कड़ाहों के पास छात्रों की भीड़ थी ,तीव्र गंध से लगा यहाँ तो छोटका-बड़का ही मिलेगा।पर पता चला की वेज भी है,चावल बिरयानी,समोसा पकौड और चाय ले सकते हैं ख़ैर चाय समोसे के लिए टोकन लिया और एक मेज़ की ओर उसने इशारा की वहाँ मिलेगा तो पहुँच कर समोसा चटनी के साथ प्लेट में ले तो लिया पर वहाँ के कप में चाय लेने की हिम्मत नही हुयी क्योंकि ननवेज मसाले की तीखी गंध नाक को बींधे जा रही थी -निगाहें हाल में हर मेज़ व हाथ में प्लेट ले निपटाते छात्रों पर थी ,फ़र्श पर गिरा पड़ा भी काफ़ी फैला था,तो मैंने फ़ाइवर ग्लास में चाय लिया और हाल के बाहर फूल पेड़ वाले खुले एरिया में जहाँ लोहे की कुर्सियाँ व बेंचेज बने हुए थे ,काफ़ी बच्चे उधर भी बैठकर नाश्ता गपशप कर रहे थे,मैं भी एक कुर्सी पर बैठ चाय पीने लगा।भाई साहब जैसा कि मुझे अंदेशा था समोसे में से भी नॉनवेज की गंध चाय के कप में भी वही गंध बस चटनी व चाय के टेस्ट में ग़नीमत थी।कहने का मतलब यह कि वहाँ अधिकांश छात्र नॉनवेज ही निपटा रहे थे और समोसे छोले वाले कम थे तथा चाय वाले तो ना के ही बराबर थे -जो लोग मटन या जो भी बिरयानी कड़ाहे से निकाल कर दे रहे थे वही लोग वेज वीरयानी व छोले भी दे रहे थे ..छोले व बिरयानी के तो कलछुले भी मुझे एक ही दिखे ।मुझे चाय देने वाला भी महक रहा था और यही मेरा पवाइंट है की कम से कम शाकाहारियों के लिए उनका कोई अलग से ध्यान नही था ।सिर्फ़ मांसाहार व उसको खाने वाले के हिसाब से पूरी व्यवस्था थी तभी तो समोसा व चाय भी उन्ही हाथों से दी जा रही थी । तो यह उनकी समझ के बाहर की बात थी की शाकाहारी लोगों को इससे दिक्कत होती होगी।वे बिलकुल बेपरवाह थे मस्त होकर कैंटीन को गड़ही में मछरी मारने की तरह बना रखे थे। हाँ पर सस्ती सामान दे रहे थे ,और व्यवहार सामान्यतह ठीक था ।मुद्दा यह है कि अभी जब छात्र सोमविर ने नॉनवेज के बचे तेल में पूरी छनकर खिलाने की शिकायत की तो वह भी इसी का प्रमाण है की शाकाहरीयों के लिए वहाँ कोई केयर नही है।शायद इसलिए भी ऐसा हो की अधिकतर बच्चे-लोग वहाँ मुस्लिम हैं-जो अमूमन नॉनवेज खाने वाले अधिक हैं।और शाकाहारी नॉनमुस्लिम ही होते होंगे,जो AMU में अल्पसंख्यक ही हैं।तो उनकी चिंता क्या करना ? बाक़ी मुस्लिम कम्यूनिटी में हाईजीन को लेकर समझ कम है इसमें कोई दो राय नहीं है। तो छात्रों के आरोपों पर आँख बंद करने से अच्छा होगा की AMU अपनी व्यवस्था में सुधार करे।उसे हाईजैनिक व बिना भेदभाव के सबके लिए संवेदनशील बनाए।...