गाज़ीपुर/उत्तर प्रदेश।
अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला... मल्ल शिरोमणि स्व मंगला राय के कुछ संस्मरण। मैंने सुना था कि उनके पास दारा सिंह का फिल्मो में काम करने हेतू प्रस्ताव आया था उस समय पहलवानी से सेवानिवृत्त होने के बाद की आर्थिक कठिनाईयों से बचने हेतु किन्तु उसे अपने अभिभावकों (प्रमुख रूप से अपने चाचा स्व राधा राय जी )के नाराजगी के भय से ठुकरा दिया क्योंकि सिनेमा और पहलवान एक नदी के दो किनारे मानें जाते थे उस समय ।तस्वीरो को देख के नई पीढ़ी शायद आश्चर्य करें कि ऐसे भी इंसान सही में होते थे क्या? आगे पढें मंगला राय के भतीजे श्री तारकेश्वर राय जी के शब्दों में- मेरा यह संस्मरण पिछले साल काका की मूर्ति अनावरण के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में छपा था ! मूर्ति का अनावरण मेरे गाँव में माननीय सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त ने माननीय मनोज सिन्हा जी सांसद और माननीया अलका राय विधायक की उपस्थिति में किया था ! - - - मंगला काका - - मुझसे अनुरोध किया गया है कि काका के बारे में कुछ लिखूं ! उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि सब विकिपीडिया पर उपलब्ध है ! नहीं उपलब्ध है तो उनके व्यक्तिगत संस्मरण जो मात्र हम लोगों की ही अमूल्य निधियां हैं ! उनकी मल्ल कला के बारे में भी मुझे बहुत कुछ ज्ञात था परन्तु वह सब पिताजी द्वारा बताया हुआ था ! इस बारे में मैंने सन 1950 में ही जब मैं दर्जा छह का विद्यार्थी था तो अपने पिताजी ( जो उनकी प्रत्येक बड़ी कुश्ती के प्रत्यक्षदर्शी थे ) द्वारा सुनकर एक बड़ा लेख भूमिहार ब्राह्मण स्कूल ( अब झारखंडे महादेव स्कूल ) की पत्रिका में लिखा था ! उसमें उनकी सभी कुश्तियों का प्रथम्दृश्या वर्णन था ! परन्तु अब उसकी याद नहीं है ! हाँ उनके साथ बिताये अमूल्य समय की स्मृतियाँ हैं सो भी उम्र के साथ धुंधली पड़ती जा रही हैं ! मैं दर्जा नौ में था ( सन 1953 )! काका की प्रसिद्द पहलवान ग़ुलाम गौस पर विजय वाली अंतिम कुश्ती बनारस में ईश्वरगंगी के पोखरे पर हो चुकी थी और वे सदा के लिए गाँव आ गए थे ! गर्मी की छुट्टियों में प्रत्येक दोपहर और शाम को मेरी उनके साथ शतरंज की बाजी होती थी ! दोपहर में उनके दुवार की खम्भिया में और शाम को काशी के बेदा पर ! मैं उस समय नौसिखुवा ही ( काका ने ही सिखाया था ) परन्तु कुछ दिन बाद ही इतना सीख गया था कि उनको चुनौती तो नहीं पर खेल का आनंद देने लगा था ! बाद में जब मैं काशी विश्वविद्यालय गया और छात्रावास में भी शतरंज खेलने लगा तो गाँव आने पर उनको कड़ी टक्कर देने लगा ! परन्तु मुझे यह कहते हुए किचित भी संकोच नही कि मैं उनसे कभी भी जीत नहीं सका ! पुराने लोग जो कहते हैं कि स्वस्थ देह में ही स्वस्थ मष्तिष्क होता है सो झूठ नहीं! ऐसे ही उनका संगीत प्रेम भी था ! खेलते समय वे कुछ न कुछ गुनगुनाया करते थे ! उनकी एक ठुमरी मुझे आज तक याद है ! “ मुरलिया कौने गुमान भरी ! रूख तोर जानत जड़ पहिचानत, जंगल की लकड़ी ” ! गला भी कमाल का ! अनेक कलावन्तों से भी उनका व्यक्तिगत परिचय था ! मुझे याद है प्रसिद्द पद्मश्री ( कालांतर में पद्मविभूषण ) सिद्धेश्वरी देवी उनके गदा की पूजा में जोगा आई थीं ! उनके साथ प्रसिद्द तबलावादक पंडित अनोखे लाल मिश्र संगत कर रहे थे ! ऐसे ही शिवमूर्ती बहन की शादी हुई तो प्रसिद्ध नर्तक पद्मश्री शंभू महाराज नेवता पर आये थे ! हाँ, एक बात और ! उनका भतीजा होने का लाभ अपने सेवाकाल में मैंने अक्सर लिया ! आजमगढ़ में सुखदेव पहलवान और गोरखपुर में ब्रह्मदेव पहलवान के अखाड़े पर मैं जाया करता था और कर्मचारियों में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ती थी ! ये दोनों प्रसिद्द पहलवान मेरे गाँव पर महीनों रह कर रियाज़ कर चुके थे ! स्मृतियाँ समाप्त नहीं होंगी ! धीरे धीरे याद आती हैं ! इसलिए विदा (यह उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन से सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक आदरणीय Tarkeshwar Rai के संस्मरण हैं)...


नई दिल्ली / मध्यप्रदेश/जबलपुर।
उस दौर में कॉफ़ी हॉउस शहर का मूड तय किया करता था अब न वे बुद्धिजीवी रहे और न वह सेंटर टेबिल -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी दो - तीन दिन पहले व्हाट्स एप पर मेरे द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के दौरान कागज पर टाईप किये हुए एक चार्ट को देखकर उसे पढ़ने का प्रयास किया तो आश्चर्य हुआ कि उसमें जबलपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे इंडियन कॉफी हॉउस के मोबाईल नम्बर के साथ सूचना थी कि 19 मई से उनके द्वारा पार्सल की होम डिलीवरी शुरू की जा रही है | शायद लम्बे लॉक डाउन के कारण हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें होम डिलीवरी शुरू करने पर मजबूर होना पड़ा | अभी कुछ दिन पहले ही मित्रवर Lakshmikant Sharma के एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने कॉफी हॉउस प्रबन्धन के मुखिया ओ.के. राजगोपाल का दर्द बयाँ करते हुए बताया कि इस सहकारी संस्था द्वारा मप्र और छत्तीसगढ में संचालित 81 और देश भर में 142 कॉफ़ी हॉउस बंद रहने से भारी नुकसान हो रहा है | इंडियन कॉफ़ी हॉउस का नाम आते ही एक पूरा अतीत मानस पटल पर उभर आता है | सत्तर - अस्सी के हलचलों से भरे हुए उन दशकों में जब जबलपुर की राजनीति के समानांतर छात्र राजनीति ने भी अपने पाँव मजबूती से जमा लिए थे , इंडियन कॉफ़ी हॉउस में ही शहर और जिले का मूड तय होता था | छात्र नेताओं के साथ राजनीतिक पार्टियों के लोग , प्राध्यापक , लेखक , पत्रकार , श्रमिक नेता और इन सबके अलावा कुछ अघोरी किस्म के लोग सुबह से रात तक इसकी कुर्सियों पर नजर आया करते थे | शहर के बीचों - बीच वाले करमचन्द चौक के कॉफ़ी हॉउस में घुसते ही जो सेंटर टेबिल थी वह बुद्धिजीवियों के उच्च सदन जैसी थी जिसकी बगल से गुजरते हम जैसे नए - नवेले वहां आसीन अनजाने व्यक्ति को भी अभिवादन करते हुए किसी दूर वाली टेबिल पर जाकर बैठते थे | वह सेंटर टेबिल थी ही ऐसी जगह जिस पर बैठे वरिष्ठजन संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों की तरह हर आने - जाने वाले पर नजर रखते थे | उस टेबिल पर रखीं एश ट्रे से धुंआ भी बिना रुके निकलता रहता था | कॉफ़ी हॉउस से मेरा भावनात्मक लगाव इसलिए था क्योंकि मैंने छुरी - कांटे का प्रयोग करते हुए डोसा खाने और फिल्टर कॉफ़ी की शुरुवात यहीं से की थी | उस समय करमचन्द चौक के अलावा कैंट (सदर) में दूसरा कॉफ़ी हाउस था जिसका हॉल किसी राजमहल के भोजन कक्ष का एहसास करवाता है | कालान्तर में शहर के विभिन्न हिस्सों में उसकी शाखाएं खुलती चली गईं और अच्छा व्यवसाय भी कर रही हैं | लेकिन मैं जिस दौर के इंडियन कॉफ़ी हॉउस की बात कर रहा हूँ उसमें सही मायनों में भारत के बहुलतावादी समाज का असली रूप नजर आता था | कोलकाता के जिस भद्रलोक की बात करते हुए दुनिया भर में कहीं भी रहने वाला आम बंगाली आत्मगौरव की अनुभूति से भर उठता है , वही एहसास बेरोजगारी के उन दिनों में दो - तीन मित्रों को महज 4 - 5 रूपये खर्च करने के बाद हो जाता था | और यदि केवल कॉफ़ी में निबट आये तो पैसे बच भी जाते थे | दरअसल वहां चारों तरफ जो विभूतयां बैठा करती थीं उनके सामने आना - जाना ही अपने आप में महत्वपूर्ण था | उस दौर में बुद्धिजीवी ही नहीं सार्वजानिक संपर्कों में रूचि रखने वाले अनेक रईस लोग भी वहां आया करते थे | पुलिस के गुप्तचर विभाग का भी कोई न कोई करमचन्द चौक कॉफ़ी हॉउस में किसी कोने में हर समय बैठा होता था क्योंकि शहर का माहौल तो वहीं से बनता - बिगड़ता था | कुछ दूर स्थित मालवीय चौक छात्र नेता से राष्ट्रीय स्तर के नेता बने शरद यादव का अड्डा था | इसलिए भी उस कॉफ़ी हॉउस में चैतन्यता महसूस होती थी | वैसे दक्षिण भारतीय व्यंजनों के कुछ और छोटे कैफे भी शहर में थे लेकिन कॉफ़ी हॉउस का माहौल ही उसकी ख़ूबसूरती थी | उसका आकर्षण इतना जबरदस्त था कि जबलपुर से बाहर जाने पर यदि कहीं कॉफ़ी हॉउस का बोर्ड दिख जाता तो बिना कॉफ़ी पीने की इच्छा के भी वहां जाए बिना नहीं रहते | 1977 में मैं अपने दो मित्रों के साथ कश्मीर गया | श्रीनगर का लाल चौक उन दिनों देर रात तक गुलजार रहता था | वहां शर्मा जी के वैष्णों होटल में हम लोग रात का भोजन करते क्योंकि दिन तो घूमने में गुजरता था | लेकिन जिस गेस्ट हॉउस में ठहरे उसमें नाश्ता घिसा - पिटा बटर टोस्ट और चाय ही थी | एक रात लौटते समय लालचौक पर पहली मंजिल में इंडियन कॉफ़ी हॉउस का साइन बोर्ड दिख गया | उसे देखकर मानों मन की मुराद पूरी हो गई और जब तक श्रीनगर में रुके सुबह का नाश्ता कॉफ़ी हॉउस में ही हुआ | उस दौर के नेता भी किसी सितारा होटल के बजाय कॉफ़ी हॉउस में बैठना पसंद करते थे | मैंने सुन रखा था कि दिल्ली के कनाट प्लेस के कॉफ़ी हॉउस में दिग्गज नेताओं की बैठक थी | मैं भी एक दो बार वहां गया किन्तु संयोगवश नेताओं में से कोई नजर नहीं आया | एक दौर था जब देश की वामपंथी और समाजवादी राजनीतिक धारा इंडियन कॉफ़ी हॉउस से ही बहती थी | यहाँ बैठने वाले साधारण व्यक्ति या मुझ जैसे छात्र में भी बौद्धिक श्रेष्ठता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता था | इस संस्थान के छोटे- बड़े कर्मचारी ही इसके मालिक होते हैं क्योंकि यह सहकारिता के आधार पर संचालित है | हर जगह एक सा फर्नीचर , साधारण किस्म के कप प्लेट , वेटर्स का अत्यंत मृदु व्यवहार , ताजी खाद्य सामग्री , हमेशा एक सा स्वाद और सबसे बड़ी बात उस ज़माने में ये थी कि जेब खाली होने पर भी वहां घंटों बैठा जा सकता था | एक टेबिल यूँ तो चार व्यक्तियों के लिए थी लेकिन संख्या बढ़ने पर टेबिल से टेबिल सटाकर क्षमता बढ़ाने की स्थायी सुविधा होती थी | एक तरह से इंडियन कॉफ़ी हॉउस उस समय एक अड्डा हुआ करता था लोगों से मिलने - जुलने , बतियाने और सामाजिक निकटता बढ़ाने का | कुछ ऐसे भी लोग उसमें आया करते थे जो अकेले ही होते और एक कॉफ़ी पीकर चले जाते | वहीं कुछ का समय तय होता जब वे मित्रमंडली सहित वहां आते और निश्चित समय तक बैठकर लौट जाते | जबकि कुछ ऐसे कॉफ़ी हॉउस प्रेमी भी रहे जो सुबह उसका दरवाजा खुलने से पहले ही आकर बाहर खड़े हो जाते | शहर के अनेक लोगों का पता ठिकाना c/o कॉफ़ी हाउस होता था | नियमित आने वालों के लिए लोग वहां सन्देश भी छोड़ जाते थे | इस प्रकार उस दौर का इंडियन कॉफ़ी हॉउस साधारण और असाधारण दोनों किस्म के लोगों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक चिन्ह हुआ करता था | उसकी सादगी में ही उसकी संपन्नता झलकती थी | फर्श पर साधारण जूट मैट और बेहद सादी क्रॉकरी तथा फर्नीचर उसकी प्रतिष्ठा में आड़े नहीं आये क्योंकि उनका उपयोग करने वालों में नामी - गिरामी हस्तियाँ जो होती थीं | लेकिन बीते एक डेढ़ दशक में कॉफ़ी हॉउस अपने उस परम्परागत स्वरूप और पहिचान को बरक़रार नहीं रख सके | कुछ में होटल भी साथ जुड़ गये | दक्षिण भारतीय के अलावा भी वहां अन्य व्यंजन उपलब्ध हैं , थाली सिस्टम भी आ गया | अधिकतर कॉफ़ी हाउसों में अब पहले जैसा बौद्धिक समागम कभी - कभार ही दिखता है | हालांकि ऐसे अनेक मित्र हैं जो आज भी कॉफ़ी हॉउस जाये बिना नहीं रह सकते | मैं भी करमचंद चौक वाले कॉफ़ी हॉउस में यदा - कदा चला जाता हूँ लेकिन उसका पूरा आकार - प्रकार ही उलट - पुलट हो गया | यद्यपि अब वहाँ परिवार सहित आने वाले बेतहाशा बढ़ गये हैं लेकिन जिस सेंटर टेबिल का जिक्र मैंने किया वह इतिहास बन गयी है | कैंट ( सदर ) वाले कॉफी हॉउस में भले ही ज्यादा बदलाव नहीं हुआ लेकिन अब वह रेस्टारेंट ज्यादा लगने लगा है | जिस वजह से वहां होने वाला एहसास भी गुम होकर रह गया | शायद बदलते समय की जरूरतों और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण कॉफ़ी हॉउस में भी बदलाव हुए , लेकिन जिस तरह बीते जमाने की सुपर हिट ब्लैक एंड व्हाईट क्लासिक फिल्म को रंगीन बनाकर दोबारा प्रदर्शित किये जाने पर भी वह अपने दौर के दर्शकों तक को नहीं खींच सकीं , वही मुझे कॉफ़ी हॉउस के मौजदा स्वरूप को देखकर प्रतीत होता है | यद्यपि आज भी वहां का स्वाद और कर्मचारियों का संस्कार अपरिवर्तित है किन्तु अड्डेबाजी वाला वातावारण और उसकी रौनक बने रहने वाली शख्सियतें उस ज़माने जैसी तो नहीं दिखतीं | बावजूद इसके अनेक बुद्धिजीवी आज भी वहां जाने का मोह नहीं छोड़ सके लेकिन अब इन्डियन कॉफ़ी हॉउस शहर की हवा का रुख तय नहीं करता | और यही कमी कम से कम मैं तो महसूस करता हूँ।...


नई दिल्ली / मध्यप्रदेश।
तुझसे था पहले का नाता कोई , यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई जीवन के बाद भी रिश्तों का निर्वहन -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी चाची जी 85 पार कर चुकी थीं | संघर्षपूर्ण जीवन के बाद जब इंसान के आराम के दिन आते हैं तभी बीमारी का पिटारा भी साथ हो लेता है | पता चला वे अस्पताल में भर्ती हैं और मुझे याद कर रही हैं | शाम को मैं पत्नी के साथ उन्हें देखने गया तो बोलीं दिव्या ( मेरी बेटी ) के बेटे को नहीं लाये | मैं लगातार कह रही हूँ कि उसे देखने की इच्छा है लेकिन सब कह देते हैं वो चंडीगढ़ में है | मैंने उनके पास जाकर कहा कि जी यही सच है | और फिर उन्हें खुश करने के लिए कह दिया खबर भेज दी है , जल्दी आ जाएगा | दैवयोग से वे स्वस्थ होकर घर लौट आईं लेकिन बीमारी धीरे - धीरे शरीर को क्षीण करती जा रही थी | बेटे - बहू , पोते - पोती सभी हरसंभव सेवा में जुटे थे | वैसे उनसे मेरा कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था | वे कायस्थ और हम ब्राह्मण लेकिन खून के रिश्ते हों तभी निभते हैं , ये सोचना गलत है | उनसे नाता 1956 में तब जुड़ा जब हमारा परिवार नागपुर से जबलपुर आया | साठिया कुआ मोहल्ले में जो मकान किराये पर पिता जी ने लिया वह पहली मंजिल पर था जिसके नीचे यही कायस्थ परिवार रहता था | इस तरह नये शहर में पहला परिचय उन्हीं से हुआ | धीरे - धीरे मेरी माता जी और चाची जी में बहिन जैसा रिश्ता बन गया | मेरी छोटी बहिन ( अब स्व. ) कुछ समय ग्वालियर में मेरी बड़ी मौसी जी के पास रही | उसी दौरान रक्षाबन्धन आया और तब चाची जी ने मुझे बुलाकर अपनी बेटी से राखी बंधवाकर रिश्ते को और मजबूत कर दिया | उनके पति रक्षा संस्थान में कार्यरत थे और वे स्वयं एक निजी स्कूल में शिक्षिका थीं | हम दो भाई एक बहिन की तरह उनके परिवार में भी दो पुत्र और एक मुझे राखी बांधने वाली बेटी थी | सब कुछ ठीक चल रहा था | हम लोग ग्रीष्म अवकाश में ग्वालियर गये हुए थे | एक दिन पिता जी का पत्र आया जिसमें चाची जी पर हुए वज्राघात का समाचार था | उनके पति अचानक चल बसे | मुझे उस समय तक इतनी दुनियादारी नहीं आती थी | इसलिए उस घटना की गम्भीरता को नहीं समझ सका किन्तु जब जबलपुर लौटे और चाची जी को देखा तब इतना तो लगा कि उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था | तीन छोटे बच्चे और प्रायवेट स्कूल की मामूली नौकरी | पति की पेंशन भी उस जमाने में बहुत ही कम थी | और यहीं से उनकी संघर्ष यात्रा शुरू हुई | चूँकि वे और मेरी माता जी एक दूसरे के बेहद निकट थीं इसलिए उनमें भी हमें माँ ही नजर आती थी | समय के साथ हम सब बड़े हो गये | उनके दोनों पुत्र भी नौकरी में आ गये | बेटी भी शिक्षिका बन गयी | सबके यथा समय विवाह भी हो गये | फिर जब साठिया कुआ छोड़ने का मन बना तब हम दोनों ने एक नई आवासीय कालोनी में अगल - बगल प्लाट खरीदे | मेरा घर तो बन गया किन्तु वे नहीं बनवा सकीं | इस तरह 27 साल बाद पड़ोस छूटा लेकिन रिश्तों में वही गहराई और मिठास बनी रही | बाद में हमारे वर्तमान निवास वाली कॉलोनी विकसित हो रही थी तब हम दोनों ने वहां भी आमने - सामने प्लाट खरीदे | यहाँ उनका घर पहले बन गया जबकि मैं कई बरस बाद इस जगह रहने आ सका | जब माँ और चाची जी फिर एक ही मोहल्ले में साथ हुईं तो वे बोलीं चलो आख़िरी समय तो साथ - साथ कटेगा | एक दिन तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ने पर अपने पूरे परिवार के सामने माता जी से बोलीं सुनो , मेरे मरने पर मुंह में गंगाजल तुम ही डालोगी | माता जी ने उनसे कहा कि इस तरह की बात क्यों बोल रही हो तब उन्होंने केवल ये कहा , मेरी इच्छा है | 2013 में मेरे नाती दिव्यांश का जन्म हुआ जिसे देखकर वे भी बहुत खुश थीं | कुछ समय बाद बेटी अपने घर चंडीगढ़ चली गई | और उसी के बाद वे गम्भीर रूप से अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती होने पर उस नाती को देखने की जिद करने लगीं | हालांकि ठीक होकर वे घर तो आ गईं किन्तु मैं जब भी मिलता तब वे दिव्या के बेटे से मिलवाने की जिद करतीं और मैं शीघ्र मिलवाने का आश्वासन देकर लौट आता | कुछ महीने बाद नाती का अन्नप्राशन था | उसे लेकर बेटी , दामाद , समधी , समधिन भी आये | जिस दिन घर में पूजन एवं कथा थी उसके दो दिन पहले से चाची जी गम्भीर हो गईं | डाक्टरों ने घर पर ही सेवा करने कहकर संकेत दे दिया | उनकी चेतना धीरे - धीरे कमजोर हो रही थी | अचानक मेरा नाम लेकर बोलीं उसे बुलाओ और मैं पहुंचा तो फिर वही फरमाइश कि दिव्या का बेटा आ गया तो उसे मेरे पास लाओ | मैं उनके अचेतन मन से निकली इच्छा को समझकर तुरंत घर लौटा और दिव्या से कहा ऐसा लगता है चाची जी की अंतिम इच्छा इस बच्चे को देखने की है | इसलिए देर मत करो | बेटी तत्काल छह माह के अपने पुत्र को लेकर गई और उनके पास जाकर कहा लो दादी मैं आ गयी | वे आँखें खोलते हुई धीमी आवाज में बोलीं , मैं तो कहती थी कि ये आ गया लेकिन कोई बुलाता ही नहीं था | कुछ देर बच्चे को निहारकर फिर अचेतन हो गईं | दिव्या बहुत भरे मन से लौट आई | रात भर जैसे - तैसे बीती | उनकी एक पोती खुद भी डॉक्टर हो गई थी | अतः जो किया जा सकता था , किया जाता रहा | मैंनें रात को पंडित जी को फोन पर स्थिति समझाते हुए सुबह जल्दी आकर अन्नप्राशन विधान एवं कथा सम्पन्न करवाने का निवेदन कर दिया था | अगले दिन धार्मिक अनुष्ठान के बीच मैं उनकी जानकारी लेता रहा | कथा सम्पन्न होने पर पंडित जी सहित सभी सम्मानीय रिश्तेदारों द्वारा भोजन करने के उपरान्त परिवारजनों ने भी भोजन प्रसाद ग्रहण किया | और इतने में ही वह खबर आ गई जिसकी आशंका थी | दिव्यांश ने जीवन में खीर के तौर पर पहली बार अन्न चखा था | सभी इस संस्कार के बाद उसे दुलार रहे थे लेकिन महीनों से उसकी प्रतीक्षा कर रहीं चाची जी चली गईं | दिव्यांश को देखने की उनकी इच्छा तो बीती रात ही पूरी हो चुकी थी किन्तु उसके जीवन के इस महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य के सम्पन्न होने तक उनका बना रहना भी इच्छा मृत्यु का उदाहरण नहीं तो और क्या था ? दूसरे दिन उनका अंतिम संस्कार हुआ | मेरी माँ का दुःख हम सभी समझ सकते थे | हमारे घर से चाची जी का घर 100 फीट से भी कम दूर नहीं है लेकिन माँ चलने में असमर्थ थीं और उतनी दूर उन्हें कार से ले जाना पड़ा | ज्योंहीं वे पहुंचकर सिसकने लगीं त्योंही परिजनों ने गंगाजल का पात्र उनके हाथ में देकर कहा अम्मा का आदेश था कि उनके मुंह में गंगाजल आप ही डालेंगी | माता जी उनसे कुछ छोटी थीं लेकिन छः दशक से भी ज्यादा की अंतरंगता के बाद इस तरह उन्हें विदा करते हुए उनके हाथ कांप रहे थे | चाची जी का अपना भरा पूरा परिवार है किन्तु मुंह में गंगा जल डालने की जिम्मेदारी माता जी को सौंपकर वे दिखा गईं कि रिश्ते जीवन के साथ ही नहीं , जीवन के बाद भी किस तरह निभाए जाते हैं | दोनों परिवारों के बीच स्नेह बन्धन यथावत है | चाची जी के नहीं रहने के बाद भी उनके परिजन पिता जी और माता जी के पास आकर सम्मान देते रहते हैं | हर भाई दूज और राखी पर मैं बहिन के घर जाना नहीं भूलता | लेकिन रह - रहकर मेरे मन में दो बातें उठती रहती हैं कि चाची जी ने माता जी को ही गंगा जल पिलाने का वह दायित्व सौंपा और दिव्यांश को देखने की इच्छा तथा फिर उसके अन्नप्राशन के विधि - विधान से पूर्ण होने होने तक ये संसार नहीं त्यागा | वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर इसमें कुछ भी असमान्य नहीं है लेकिन भावनात्मक दृष्टि से देखने पर लगता है कि इंसान को केवल साँसें ही नहीं अपितु रिश्ते भी जीने की शक्ति देते हैं | माता जी कहने को केवल उनकी पड़ोसी थीं जिनसे निकट सम्बन्ध बन जाना अनोखी बात नहीं थी | ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जायेंगे किन्तु उनके हाथों से गंगा जल ग्रहण करने की उनकी इच्छा और फिर दिव्यांश को देखने तक उनका जीवित बने रहना महज संयोग नहीं हो सकता | ऐसा लगता है इस तरह के सम्बन्ध पिछले जन्मों से जुड़े होते हैं | जिन्हें केवल महसूस करते हुए जिया और निभाया जा सकता है | अत्यंत विषम परिस्थितियों में उन्होंने जिस साहस और स्वाभिमान के साथ ज़िन्दगी गुजारी उसे मैंने निकट से देखा था | इसलिए मेरी पीढ़ी तक से उनका लगाव समझ में आता है | लेकिन जीवन के अंतिम क्षणों में और दो पीढ़ी बाद के नन्हें से बच्चे को देखकर ही प्राण त्यागने की उनकी इच्छाशक्ति के पीछे पिछले किसी जन्म का कोई सम्बन्ध था या कुछ और ये मैं आज तक नहीं समझ सका | आज जब खून के रिश्तों में दरारें आते देर नहीं लगतीं तब इस तरह के सम्बन्ध कैसे बनते और पीढ़ी दर पीढ़ी निभते हैं ये जाते - जाते चाची जी सिखा गईं |...


नई दिल्ली / प्रयागराज।
उस विचारधारा को याद करने का समय एक बार फिर आ गया है, जिसे पूरी दुनिया प्रकृति के कहर के आगे आज मजबूरी में अपना रही है। इस विचारधारा की नींव आज़ादी बचाओ आन्दोलन (पूर्व नाम—लोक स्वराज्य अभियान) ने 5 जून, 1989 को इलाहाबाद की धरती पर रखी थी। मूलमन्त्र था—स्वदेशी और स्वावलम्बन। फेसबुक पर कई मित्र उस दौर की यादें ताज़ा कर रहे हैं तो अच्छा लग रहा है। उत्कर्ष मालवीय ने तब का नारा याद दिलाया—‘बाटा, लिप्टन, पेप्सीकोला...सब पहने हैं ख़ूनी चोला।’ वे कई नारे याद आ रहे हैं, जो तब हमने गढ़े थे और बाद में पूरे देश में गूँजने लगे थे। मसलन... ‘देश हमारा माल विदेशी, नहीं चलेगा नहीं चलेगा’, ‘जागो फिर एक बार, विदेशी का बहिष्कार’, अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’ आदि-आदि। शुरू में हम बस कुछ गिनती के लोग थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित विभाग के तब के अध्यक्ष प्रो. बनवारीलाल शर्मा हमारे अगुआ थे। विश्वविद्यालय के ही एक विभाग ‘गान्धी शान्ति एवं अध्ययन संस्थान’ (गान्धी भवन) को हमने अपना ठीया बनाया हुआ था। ‘स्वदेशी बनाम बहुराष्ट्रीय निगमें परियोजना’ नाम देकर हमने एक शोध करना शुरू किया। जो जानकारियाँ बाहर आईं, वे अजब-ग़ज़ब और चौंकाने वाली थीं। मज़ेदार कि जिस ईस्ट इण्डिया कम्पनी को खदेड़ने के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई, वह रूप बदल कर इस देश में दवा बेचने का धन्धा कर रही थी। लोगों को ज़रा भी अन्दाज़ा नहीं था कि हिन्दुस्तान लीवर नाम की कम्पनी हिन्दुस्तान की नहीं है। डालडा वनस्पति, सनलाइट, लाइफबॉय, कोलगेट घरों में इस्तेमाल होने वाले सबसे लोकप्रिय उत्पाद थे और देश के ही लगते थे। बहरहाल, इलाहाबाद के नौजवानों ने बहुराष्टीय विदेशी कम्पनियों के ख़िलाफ़ स्वदेशी के आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। बात बढ़ने लगी और चीज़ों को ठीक से सँभालने की ज़रूरत लगी तो हमने अपनी-अपनी रुचि के हिसाब से काम का बँटवारा कर लिया। कुछ लोग भाषण देने निकले, कुछ जनसम्पर्क पर, तो कुछ साहित्य और पत्रिकाएँ सँभालने लगे। दुर्भाग्य से आजकल के ज़्यादातर युवा उस आन्दोलन के सिर्फ़ राजीव दीक्षित को ही जान पा रहे हैं, जबकि एक बड़ी सङ्ख्या ऐसे कार्यकर्ताओं की है, जिनकी भूमिकाएँ कई मामलों में और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण रही हैं। वे भाषण नहीं देते थे, तो उनके चेहरे आमजन के सामने नहीं होते थे। दुर्भाग्य यह भी है कि अपने देहावसान के आख़िरी दिनों में राजीव जी ने वाग्भट के आयुर्वेद पक्ष पर जो कुछ बोला, तो स्वास्थ्य के मुद्दे के नाते कुछ लोगों ने यूट्यूब पर उसे ही ज़्यादा प्रचारित कर दिया। नतीजतन, आजकल ज़्यादातर लोग राजीव दीक्षित को डॉक्टर, वैद्य जैसा कुछ समझने लगे हैं, जबकि अर्थव्यवस्था और समाज-व्यवस्था के सवालों पर उनके भाषणों को सुना जाना चाहिए। शुरू के दिनों का हाल यह था कि ग्लोबल होने की पिनक में सत्ता के कर्ताधर्ता और राजनीति के खिलाड़ी इस विचारधारा का मज़ाक़ उड़ा रहे थे कि देश को देश के संसाधनों से आत्मनिर्भर भला कैसे बनाया जा सकता है? बावजूद इसके, आज़ादी बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ताओं ने अपना जुनून और धुन बनाए रखा। धीरे-धीरे आन्दोलन की धमक यहाँ तक पहुँची कि पेप्सी जैसी कम्पनी बहुत समय तक इलाहाबाद में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं कर पाई। युवाओं की एक बड़ी सङ्ख्या थी, जिसने दिन-रात एक कर दिया था। मैंने इतने निश्छल कार्यकर्ता किसी और आन्दोलन या सङ्गठन में आज तक नहीं देखे। जाने कितने लोगों ने पढ़ाई-लिखाई की चिन्ता छोड़ दी थी। मेरी तरह तमाम नौजवानों ने देश के लिए घर-परिवार तक से नाता तोड़ने का मन बना लिया था। आईएएस, पीसीएस का मोह छोड़कर छात्र इसमें शामिल हो रहे थे। इक्का-दुक्का नाम देना उचित नहीं समझ रहा हूँ। इन सबके नाम बड़े तरतीब से याद करने पड़ेंगे, वरना अन्याय होगा। ये ऐसे नाम हैं, जिनमें आज़ादी की लड़ाई के क्रान्तिवीरों की छवियाँ मुझे दिखाई देती रही हैं। काश, कुछ लोगों की बेवकूफ़ियों से आन्दोलन खण्डित न हुआ होता, तो आज देश का चेहरा शायद कुछ और दिखाई देता। यह जो अन्ना आन्दोलन और केजरीवाल एण्ड कम्पनी की जलवानुमाई आपने पिछले कुछ वर्षों में देखी...यह पूरा भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन उसी आज़ादी बचाओ आन्दोलन के टूटते-बिखरते खण्डहर से निकली धारा थी। मुझे वह समय याद आ रहा है, जब हमने मॉरीशस के रास्ते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा हर साल की जा रही देश के क़रीब सत्तर हज़ार करोड़ रुपये की लूट के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया तो अरविन्द केजरीवाल ने बड़ी मेहनत से ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने का काम किया था। आज की तारीख़ में आज़ादी बचाओ आन्दोलन को ज़्यादा लोग नहीं जानते। नई पीढ़ी को नहीं पता कि यही वह सङ्गठन है, जिसने बहुराष्ट्रीय शब्द दिया ही नहीं, बल्कि इस पूरे मुद्दे को देश की सीमाओं के पार वैश्विक स्तर पर चर्चा के केन्द्र में लाने का काम किया। वे दिन मुझे याद हैं जब इलाहाबाद में आन्दोलन का जलवा अजब ही हो गया था। एक बार हमने घोषणा कर दी कि हम लखनऊ में रैली करेंगे। यह सिर्फ़ घोषणा भर थी, काम कुछ नहीं किया गया था। लखनऊ पहुँचने वाले गिनती के सिर्फ़ कुछ सौ लोग थे, पर तब के मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव ने हमारी सुरक्षा में हज़ारों पुलिसकर्मी लगा दिए। बाद में वे मिले और उन्होंने कहा कि यह मेरा दायित्व है, आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं मैं आपके समर्थन में हूँ। हमने विचारधारा की कोई ज़िद नहीं पाली थी। हमारे दरवाज़े खुले थे कि जो भी देश-समाज का भला चाहता हो, इस काम में सहयोगी बन सकता है। मार्क्सवादी छात्र सङ्गठन ‘आइसा’ वग़ैरह हमारे साथ थे। समाजवादी धारा के जार्ज फर्नाण्डीज, रविराय, सुरेन्द्र मोहन जैसे लोग एक समय में पूरी तरह से राजनीति छोड़कर आज़ादी बचाओ आन्दोलन में शामिल हो गए थे; पर थे अन्ततः राजनीति के कीड़े, इसलिए चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी कैसे छोड़े...तो बाद में हम लोगों ने मजबूरन राजनीतिक लोगों के लिए आन्दोलन में शामिल होने पर पाबन्दी लगाई। शुरू में विद्यार्थी परिषद के लोग हमारे साथ शामिल होते थे। बाद के दिनों में उन्हीं के ज़रिये यह मुद्दा आरएसएस तक पहुँचा और हम लोगों ने उनका स्वदेशी जागरण मञ्च बनवाने में काफ़ी सहयोग किया। हमारा जितना शोध था, पर्चे-पोस्टर थे, सब उनको उपलब्ध कराया। स्वदेशी जागरण मञ्च के शुरू के जितने भी पर्चे-पोस्टर थे, वे सब आज़ादी बचाओ आन्दोलन या कहें, लोक स्वराज्य आभियान के पर्चे-पोस्टर थे। उन पर बस हमारा नाम हटाकर स्वदेशी जागरण मञ्च का नाम चस्पाँ कर दिया गया था। हमारा उद्देश्य बस इतना था कि जैसे भी हो, स्वदेशी का मुद्दा देश में प्रचारित होना चाहिए। हमें हर संस्था-सङ्गठन में प्यारे लोग मिले। स्वदेशी जागरण मञ्च में भी कई प्यारे लोग थे, पर उनकी दिक़्क़त यह थी वे भाजपा की रीति-नीति पर ही निर्भर थे और कई बार उन्हें अपनी इच्छा के विपरीत चलना पड़ता था। ख़ैर, बातें यादें बड़ी-बड़ी हैं, पर असली बात है कि मुद्दा महत्त्वपूर्ण है, जिसे आज क़ुदरत के करिश्मे ने प्रासङ्गिक बना दिया है। मजबूरी में ही सही, इन राजनीतिक घोषणाओं का स्वागत किया जाना चाहिए, पर सिर्फ़ घोषणाओं से बात नहीं बनती। आज़ादी बचाओ आन्दोलन जिस समाज-व्यवस्था की बात करता रहा है, उस पर गम्भीरता से सोचा जाना चाहिए। अभी वक़्त है, शायद इस दिशा में कुछ काम आगे बढ़ जाय, वरना आदमी कुत्ते की पूँछ से कहाँ कम है! जैसे ही कोरोना का डर ख़त्म होगा, हम फिर वही प्रकृति-विरोधी रङ्ग-ढङ्ग अपनाना शुरू कर देंगे, जिसके ख़ामियाज़े के तौर पर इस हस्र तक पहुँचे। तीन दशक पहले की गई आज़ादी बचाओ आन्दोलन की भविष्यवाणियाँ हूबहू सच साबित हो रही हैं। स्वदेशी-स्वावलम्बन की पटरी से देश के उतरने के नतीजे का परावलम्बन इससे बड़ा क्या हो सकता है? यह रोज़गार की कैसी अवधारणा, जो करोड़ों लोगों को पलायन पर मजबूर कर दे और एक अदना-से कोरोना का आतङ्क आते ही विकास के पहियों तले कुचल दे। हज़ार-हज़ार किलोमीटर दूर से इस मुश्किल की घड़ी में किसी भी तरह से अपनी चौखट छू लेने की चाहत लिए लोग पैदल निकल पड़ें और आधी दूरी नापते-नापते दम तोड़ने लगें, तो देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? स्वदेशी के सहारे स्वावलम्बन का मर्म समझा गया होता तो आज ये दिन देखने की नौबत नहीं आती। विदेशी यात्राएँ भी हम ज़रूरत भर को करते और इस तरह वहाँ से कोरोना की सौगात लेकर नहीं आते। अगर यह वायरस किसी प्रयोगशाला में विकसित किया गया है, तो भी यही समझिए कि इसके पीछे दुनिया पर व्यापारिक क़ब्ज़े की ही मानसिकता ही काम कर रही है, जो स्वदेशी की अवधारणा में सम्भव नहीं हो सकती थी। स्वदेशी का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि विदेशी के बजाय देशी सामान ख़रीद लिया जाय। स्वदेशी एक पूरी विचारधारा है, जो हर तरह के शोषण के विरुद्ध समाज को आत्मनिर्भर बनाती है। स्वदेशी की समझ हमारे सत्ताधीशों को हो जाए तो बेरोज़गारी की समस्या का समाधान आसान हो जाएगा। स्वदेशी समाज के रिश्ते मजबूत करती है और ख़ुद की अस्मिता से गुज़रते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सही मायने में चरितार्थ करती है। मैं यही कह सकता हूँ कि हर सोचने-समझने वाले व्यक्ति को अपनी चिन्तनधारा में इसे शामिल करना चाहिए और आवाज़ उठानी चाहिए कि आख़िर इस देश को हमें किस रास्ते पर आगे ले जाने की ज़रूरत है। शिद्दत से याद करना चाहिए कि देश की आबादी वही है, पर लॉकडाउन के इस कोरोना-काल में सिर्फ़ हमारी हरकतें बदलीं कि नदियाँ, हवा, आसमान... सब मुस्कराने लगे। इतना साफ़-सुथरा प्रदूषणमुक्त पर्यावरण तथाकथित विकास-काल में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। मैं महानगर की इस घनी आबादी में कई दिनों से देर शाम कोयल की कूँक सुन रहा हूँ। साफ़-सुथरे आसमान में तारे गिनने के दिन जैसे फिर लौट आए हैं। मतलब साफ़ है, समस्या आदमी की आबादी से नहीं, उसकी हरकतों से है। हरकतें राह पर हों तो प्रकृति जीवन के रास्ते में कभी बाधा नहीं खड़ी करती, क्योंकि प्रकृति की प्रकृति बुनियादी रूप से जीवनोन्मुखी है। चिकित्साविज्ञानी भी कहते हैं कि साफ़ हवा और सूरज की रोशनी संसार के सबसे बड़े एण्टीवायरल उपादान हैं। इनका संयोग सही रहे तो कोई भी वायरस जीवन के लिए ख़तरनाक नहीं हो सकता। आहार-विहार के साथ प्रदूषण रोग-प्रतिरोधक शक्ति में पलीता लगाने का सबसे बड़ा कारक है। याद रखने की बात है कि अगर आदमी ने अपनी हरकतों से ज़हरीला न बना दिया हो तो, जङ्गल के साफ़ पर्यावरण में किसी जीव-जन्तु को कभी डॉक्टर और अस्पताल की ज़रूरत नहीं पड़ती। कुल बात यह कि क्या हमारे रहनुमा कोरोना को सचमुच प्रकृति का सबक़ मान पाएँगे और देश को विकास के सही रास्ते पर ले जाने का काम कर पाएँगे...या कुछ दिनों बाद हम फिर उसी भेड़चाल में शामिल होने को अभिषप्त होंगे? महाबली अमेरिका के घुटने टेक देने के बाद भी प्रकृति को जीत लेने का हमारा दम्भ अगर कम न हो तो क्या किया जा सकता है! प्रकृति का क्या, वह ख़ुद को सन्तुलित करना जानती है। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन कोरोना से हज़ार गुना ख़तरनाक वायरस आए और सूरज, चाँद, सितारों की तमाम दूरियाँ नापते रहने के बावजूद हमारा सारा हिसाब-किताब बराबर कर जाए। लोकल पर वोकल होइए और इसे ग्लोबल बनाइए...यह अच्छा है, पर महज़ नारा न हो तो। बीस लाख करोड़ का पैकेज भी लोगों का सहारा बन सकता है, पर इसका भी सही इस्तेमाल हो तो। अभी का हाल यह है कि हरेक कोरेण्टाइन व्यक्ति पर हर दिन के लिए छह हज़ार रुपये की रक़म तय की गई है, पर कई इलाक़ों में मरीज़ के माँगने पर पीने का साफ़ पानी तक नहीं दिया जा रहा। मौतों की बिना पर अफ़सर अपनी जेबें भरना ज़्यादा ज़रूरी समझ रहे हैं। बीस लाख करोड़ के पैकेज का ज़्यादा हिस्सा नेताओं, अफ़सरों की मौज-मस्ती में काम आएगा या आमजन का सहारा बनेगा...इस बात को ठीक से सोचते-विचारते हुए हमारे प्रधानमन्त्री आगे बढ़ेंगे तो सचमुच देश का भला हो सकता है; अन्यथा आम आदमी की नियति में बदहाली और मौत लिखने के लिए सत्ता की कुर्सी पर ब्रह्मा बैठे ही हैं।...


नई दिल्ली।
हमारे यहां जो पुलिस वाले सिक्योरिटी में रहते हैं, मैं रोजाना सुबह शाम उनको चाय बिस्किट भिजवाती हूँ. इधर 2-3 दिन से मेड लौटकर बताती है कि पुलिसवाले कहने लगे हैं कि चाय की जरुरत नहीं. फिर भी मैंने सुबह चाय भिजवाई. अपने कमरे में खिड़की पर खड़ी उधर ही देख रही थी जिधर पुलिसवाले बैठे रहते हैं. मेड उनको चाय देकर लौट आई, और उधर अगले मिनट ही तीनों सिपाहियों ने चाय बगल में जमीन पर फेंक दी. मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं बाहर जाकर उन्हें हडकाने की सोच ही रही थी कि कुछ सोचकर चुप हो गई. गलती उनकी भी नहीं है. शायद वो लोग भी यही सोचते हों कि मैं चाय में थूकने के बाद उन्हें चाय भिजवाती हूं. यह सब सोचकर ही मेरे तन बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई. शर्म आई अपने मुस्लिम होने पर. आज शाम ही साहब को बोलकर एक हिन्दू मेड का इंतजाम करने को कहूंगी जिससे बाद में पुलिसवालों को मुझपर या अभी वाली मुस्लिम मेड पर थूक मिली चाय भेजने का शक न रहे. इन जमातियों ने पिछले 15-20 सालों में लगातार खराब होते हिन्दू मुस्लिम रिश्तों को बहुत नीचे गिरा दिया है. यह आपसी अविश्वास अब जल्द खत्म नहीं हो सकेगा और पहले से ही गरीब मुस्लिमों को इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा जब अधिकतर हिन्दू मुस्लिमों से न फल सब्जी खरीदेंगे, न मुस्लिम रेस्टोरेन्ट में खाना खाने जायेंगे.. और अगर यह अविश्वास इतना बढ़ गया कि हिन्दुओं ने सभी मुस्लिम मिस्त्री (बिजली, लकड़ी, लोहा, गाड़ी बाइक को सही करने वाले, मकान बनाने वाले आदि) का बहिष्कार कर दिया तो लाखों मुस्लिम भूखे मर जायेंगे या फिर हिन्दू धर्म अपना लेंगे. मेरे सिक्योरिटी वाले पुलिस वाले भाइयों. मैं तुमसे मुंह पर आकर कुछ नहीं कह सकती, लेकिन विश्वास करो, तुम्हारी मैडमजी ने कभी भी तुम्हें अपनी झूठी चाय या कोई सामान कभी नहीं भेजा. सिर्फ तुम लोगों का शक दूर करने के लिए जल्द ही हिन्दू मेड का इंतजाम भी हो जायेगा....