नई दिल्ली/भारत।
यादों के झरोखे से part-1 जब अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में धक्का खाते हुए सफर दिया करते थे! आज की पीढ़ी को शायद इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी पांच वर्षों तक दिल्ली परिवहन की आम बसों में साधारण यात्रियों की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। सन् 1957 के चुनाव में अटल जी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। एक सांसद के रूप में उन्हें साउथ एवेन्यू में फ्लैट नम्बर-110 पहली बार अलाॅट हुआ था। इस फ्लैट में तब अटल जी अकेले ही रहा करते थे। उन दिनों साउथ एवेन्यू में ही भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी रहते थे। उनके घर में उनके साथ कई संघ प्रचारक भी रहते थे। इनमें से पांचजन्य के यशस्वी सम्पादक यादवराव देशमुख, रमिन्द्र बनर्जी आदि का नाम उल्लेखनीय है। उन दिनों मैं भी साउथ एवेन्यू में ही रहा करता था। तब मैं कुंवारा था। इसलिए अटल जी एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि के साथ हम लोग साउथ एवेन्यू की कैंटीन में ही भोजन किया करते थे। तब इस कैंटीन में भोजन की एक थाली 60 पैसे में मिलती थी। उन दिनों जनसंघ पार्टी की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर थी। इसलिए पार्टी के सभी सांसद अपना सम्पूर्ण वेतन और भत्ता पार्टी फंड में दे दिया करते थे। उन्हें भोजन आदि के लिए पार्टी द्वारा एक सौ रुपये मासि भत्ता दिया जाता था। यही धनराशि अटल जी और ठेंगड़ी जी को भी प्राप्त होती थी। इसलिए यह दोनों हमेशा आर्थिक संकट से जूझा करते थे। तब अटल जी के पास अपना कोई निजी वाहन नहीं था। टैक्सी या स्कूटर किराये पर लेना आर्थिक संकट के कारण सम्भव नहीं था। इसलिए अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में आम यात्री की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। अटल जी ने पहली कार वर्ष 1967 में ली थी। उन दिनों जनसंघ का मुख्य कार्यालय अजमेरी गेट के समीप एक कमरे में हुआ करता था। एक अन्य प्रचारक जगदीश माथुर मीडिया प्रभारी थे। दत्तोपंत ठेंगड़ी को खाने-पीने का कोई खास शौक नहीं था। मगर अटल जी और जगदीश माथुर मिष्ठान और चाट प्रेमी थे। इसलिए इन दोनों को जब मौका मिलता यह दोनों चावड़ी बाजार, बाजार सीताराम और हौज काजी आदि के चक्कर लगाते और तरह-तरह की मिष्ठान की दुकानों और चाट भंडारों को तलाशते। अटल जी को सड़क पर खड़े होकर खाना-पीना पसंद नहीं था इसलिए वह इन दुकानों से भांति-भांति के मिष्ठान साथ बांधकर ले आते। अगर ऐसे मौकों पर हम भाजपा के दफ्तर में मौजूद होते तो फिर हमारी ईद होती और खूब डटकर मिष्ठानों और चाट पर हाथ साफ किया करते थे। अटल जी इसके साथ-साथ ठंडई के भी बेहद शौकीन थे। अब इनमें से हमारे अधिकांश साथी इस दुनिया से कूच करके वहां चले गए हैं जहां से कोई वापस नहीं लौट पाता। उनकी सिर्फ स्मृति ही शेष रह गई है।...


उत्तरप्रदेश/प्रयागराज/लखनऊ।
चन्द्रशेखर 'आजाद' (२३ जुलाई १९०६ - २७ फ़रवरी १९३१) - चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा। उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहाबाद के गांधी आश्रम के एक सज्जन मेरे पास आये। उन्होंने बताया कि आज़ाद शहीद हो गए हैं। उनके शव को लेने के लिए मुझे इलाहाबाद बुलाया गया है। उसी रात्रि को साढ़े चार बजे की गाड़ी से मैं इलाहबाद के लिए रवाना हुआ। झूँसी स्टेशन पहुँचते ही एक तार मैंने सिटी मजिस्ट्रेट को दिया कि आज़ाद मेरा सम्बन्धी है, लाश डिस्ट्रॉय न की जाये। इलाहबाद पहुंचकर मैं आनंद भवन पहुँचा तो कमला नेहरू से मालूम हुआ कि शव पोस्टमार्टम के लिए गया हुआ है। मैं सीधा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बँगले पर गया। उन्होंने बताया कि आप पुलिस सुपरिंटेंडेंट से मिल लीजिये। शायद शव जला दिया गया होगा, मुझे पता नहीं कि शव कहाँ है। मैं सुपरिंटेंडेंट से मिला तो उन्होंने मुझसे बहुत वाद-विवाद किया। उसके बाद उन्होंने मुझे भुलावा देकर एक खत दारागंज के दरोगा के नाम से दिया कि त्रिवेणी पर लाश गयी है, पुलिस की देखरेख में इनको अंत्येष्टि क्रिया करने दी जाये। बंगले से बाहर निकला तो थोड़ी ही दूर पर पूज्य मालवीय जी के पौत्र श्री पद्मकांत मालवीय जी दिखाई दिए। उन्हें पता चला था कि मैं आया हुआ हूँ। उनकी मोटर पर बैठकर हम दारागंज पुलिस थानेदार के पास गए। वे हमारे साथ मोटर में त्रिवेणी गए। वहाँ कुछ था ही नहीं। हम फिर से डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बंगले की तरफ जा रहे थे कि एक लड़के ने मोटर रुकवा कर बताया कि शव को रसूलाबाद ले गए हैं।” “रसूलाबाद पहुंचे तो चिता में आग लग चुकी थी। अंग्रेज सैनिकों ने मिट्टी का तेल चिता पर छिड़क कर आग लगा दी थी और आस पास पड़ी फूस भी डाल दी थी ताकि आग और तेज हो जाये। पुलिस काफी थी। इंचार्ज अफसर को चिट्ठी दिखाई तो उसने मुझे धार्मिक कार्य करने की अनुमति दे दी। हमने फिर लकड़ी आदि मंगवाकर विधिवत दाह संस्कार किया। चिता जलते जलते श्री पुरुषोत्तमदस टंडन एवं कमला नेहरू भी वहाँ आ गयीं थीं। करीब दो-तीन सौ आदमी जमा हो गए। चिता के बुझने के बाद अस्थि-संचय मैंने किया। इन्हें मैंने त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दिया। कुछ राख एक पोटली में मैंने एकत्रित की तथा थोड़ी सी अस्थियाँ पुलिस वालों की आँखों में धूल झोंक कर मैं लेता आया। उन अस्थियों में से एक आचार्य नरेंद्रदेव भी ले गए थे, शायद विद्यापीठ में जहाँ आज़ाद के स्मारक का पत्थर लिखा है, वहां उन्होंने उस अस्थि के टुकड़े को रखा है। सायंकाल काले कपड़े में आज़ाद की भस्मी का चौक पर जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरुद्ध हो गयीं। ऐसा लग रहा था मानो सारा देश अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। जलूस के बाद एक सभा हुई। सभा को क्रांतिधर्मा शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने संबोधित करते हुए कहा-जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया, वैसे ही चंद्रशेखर आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। शाम की गाड़ी से मैं बनारस चला गया और वहां विधिवत शास्त्रोक्त ढंग से आज़ाद का अंतिम संस्कार किया।” शिवविनायक जी जो अस्थियाँ अपने साथ चोरी-छिपे ले गए थे, उन्हें उन्होंने एक ताँबे के पात्र में अपने घर की दीवार में छिपाकर रख दिया तथा अपनी मृत्यु से पहले उनकी देखभाल के लिए पाँच विश्वासपात्र साथियों का एक ट्रस्ट बना दिया। 1975-76 तक उन अस्थियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। हां, ये सुनने में अवश्य आता रहा कि मिश्रा जी के सुपुत्रगण उन अस्थियों के बदले में कुछ चाहते हैं। 1976 में नारायणदत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने शहीद ए आजम भगत सिंह के छोटे भाई सरदार कुलतार सिंह को राज्यमंत्री बनाकर उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। चंद्रशेखर आज़ाद के साथी रामकृष्ण खत्री ने कुलतार सिंह जी से मिलकर उन अस्थियों के सम्बन्ध में चर्चा की और फिर इन दोनों ने शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर शिवविनायक मिश्रा जी के सुपुत्रों को समझा बुझाकर उन्हें अस्थियां देने को राज़ी कर लिया। जून 1976 के अंतिम सप्ताह में वो अस्थियां मिश्रा जी के घर से लाकर ताँबे के कलश में विद्यापीठ में रखी गयीं। 1 अगस्त 1976 को अस्थिकलश की शोभायात्रा विद्यापीठ वाराणसी से प्रारम्भ हुयी और वहाँ से रामनगर, चुनार, मिर्ज़ापुर, इलाहबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, सोख्ता आश्रम, कालपी, उरई, मोंठ, झांसी, सातार-तट (ओरछा मध्य प्रदेश), कानपुर, बदरका (उन्नाव) होते हुए 10 अगस्त 1976 को लखनऊ पहुंची। रास्ते में पड़ने वाले हर नगर, कसबे, गाँवों में हजारों हजार लोगों ने इस शोभायात्रा का स्वागत किया और "चन्द्रशेखर आज़ाद अमर रहें" के नारों से आसमान को गुंजा दिया। लखनऊ के बनारसीबाग स्थित संग्रहालय के प्रांगण में अस्थिकलश समर्पण का आयोजन हुआ और इस यात्रा में शामिल रहे चंद्रशेखर आज़ाद के साथी क्रांतिकारियों ने वह अस्थिकलश संग्रहालय के अधिकारियों को समर्पित कर दिया। तब से जनता के दर्शनार्थ वह अस्थिकलश वहां एक विशेष कक्ष में रखा हुआ है। अल्फ्रेड पार्क में जिस वृक्ष के नीचे चंद्रशेखर आज़ाद ने वीरगति प्राप्त की थी, घटना के दूसरे दिन से बहुत से लोग राष्ट्रीय वीर की स्मृति में उस पेड़ की पूजा करने लगे। पेड़ के तने में बहुत सी गोलियाँ धंस गयीं थीं। श्रद्धालु लोगों ने पेड़ के तने पर सिन्दूर पोत दिया और वृक्ष के नीचे धूप-दीप जलाकर फूल चढ़ाने लगे। शीघ्र ही वहां सैकड़ों की तादाद में पूजा करने वाले पहुँचने लगे। ब्रिटिश सरकार के लिए तो यह असहनीय था और इसलिए उसने वह पेड़ कटवा दिया, परन्तु जनता तभी से एल्फ्रेड पार्क को आज़ाद पार्क पुकारने लगी और पार्क का यही नाम प्रचलित हो गया। दो बातें यहाँ कहने से मैं स्वयं को नहीं रोक पा रहा हूँ–एक, तब लोगों द्वारा उस पेड़ की पूजा करना जहाँ उनके श्रद्धालु होने की गवाही देता है, वहीं ये भी बताता है कि हम अपने नायकों के साथ उनके जीते जी तो कभी खड़े होते ही नहीं, उनकी मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा छोड़े गए अधूरे कामों को पूरा करने को लेकर हम में कोई आग्रह नहीं होता। हमारे लिए सबसे मुफीद पड़ता है, किसी भी महापुरुष को चार हाथों वाला बनाकर उसे भगवान की श्रेणी में खड़ा करके, उसकी पूजा अर्चना करके उनके आदर्शों, कर्मठता, त्याग और बलिदान को अपनाने से छुट्टी पा जाना, इस तर्क की आड़ में कि अरे वो तो अवतार थे, देवता थे, भगवान थे। जब तक हम अपने देश में समय समय पर हुए महापुरुषों की लम्बी श्रृंखला से कुछ सीखेंगे नहीं, उनके आदर्शों को जीवन में अपनाएंगे नहीं, अपने बच्चों को उनके जैसा बनने की प्रेरणा देंगे नहीं, हमारे द्वारा उन्हें याद करना व्यर्थ ही रह जाएगा। दूसरी बात, उस पार्क में घूमने जाने वाले लोगों से सम्बंधित है, जिनके लिए वो महज एक पिकनिक स्पॉट भर है, जहाँ जाकर बस फोटो खींचनी है, खाना पीना है और मस्ती करनी है। कड़वी बात के लिए माफ़ करियेगा, पर अगर उस तपोभूमि पर जाकर भी किसी के मन में उस क्रांतिधर्मा की याद नहीं आती; वीरता का वो अमर दृश्य आँखों के सामने नहीं खिंचता; 25 वर्षीय उस नौजवान सेनानी, जिसने भारतमाता की सेवा के लिए अपनी माँ को भी बिसरा दिया, को याद करके आँखें नम नहीं होती तो मेरे लिए वो व्यक्ति मुर्दे से भी बदतर है। अफ़सोस, मैं जितनी बार भी वहाँ गया, मुझे वहाँ मुर्दे ही दिखे, जिनके लिए आज़ाद की मूर्ति के पास बना चबूतरा खाने पीने या गप्पें मारने के काम के लिए है और वो मूर्ति उनके बच्चों के छुपन-छुपाई खेलने के काम के लिए। चंद्रशेखर आज़ाद की ‘पिस्तौल’ जहाँ तक आज़ाद की पिस्तौल वापस मँगाने से सम्बंधित किस्से की बात है, ये तब की बात है, जब 1969-70 में चन्द्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। एक दिन जयदेव कपूर और वचनेश त्रिपाठी ने चंद्रशेखर आज़ाद के साथी रहे रामकृष्ण खत्री को सूचना दी कि उन्हें पता चला है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस बीच बीच में विभिन्न स्थानों पर डाकुओं से पकड़े गए हथियारों की प्रदर्शनी लगाया करती है, जिनके साथ ही शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की पिस्तौल को भी रखा जाता है। ये खबर हृदय को चोट देने वाली है और इस सम्बन्ध में कुछ करना चाहिए। खत्री जी और आज़ाद के कुछ अन्य साथियों ने चन्द्रभानु गुप्त से मिलकर इस बात की जानकारी दी और आज़ाद की उस पिस्तौल को उचित सम्मान देने की अपील की। गुप्त जी ने प्रदेश के तत्कालीन गृह सचिव श्री मुस्तफी जी को इस सम्बन्ध में कार्रवाई करने के लिए आदेशित किया, जिन्होंने उस पिस्तौल की खोज के लिए दिन रात एक कर दिया। अंततः इलाहबाद मालखाने के 1931 के रजिस्टर में 27 फरवरी की तारीख में आज़ाद के पास से मिली पिस्तौल का उल्लेख और विवरण मिला, जिसके साथ ही एक नोट में लिखा हुआ था कि वह पिस्तौल नॉट बाबर एस एस पी को (जिनकी पहली गोली से आज़ाद घायल हुए थे) इंग्लैण्ड जाते समय कुछ चापलूस पुलिसवालों ने भेंट कर दी थी, जिसे वह अपने साथ इंग्लैण्ड ले गए थे। चूँकि नॉट बाबर उत्तर प्रदेश सरकार से पेंशन पाते थे, श्री मुस्तफी ने उन्हें वह पिस्तौल तुरंत वापस करने के लिए लिखा। लेकिन काफी इंतज़ार के बाद भी जब उनसे कोई जवाब नहीं मिला तब इस मामले में केंद्र से मदद माँगी गयी। केंद्रीय शासन के सम्बंधित सचिव ने इंग्लैण्ड में उस समय के अपने हाई कमिश्नर अप्पा साहब को लिखा कि श्री नॉट बाबर से मिलकर और उन्हें समझा बुझाकर अथवा वह जो मूल्य माँगें, उसे देकर हर हाल में वह पिस्तौल प्राप्त कर ली जाये। पहले तो नॉट बाबर ने आनाकानी की पर बाद में समझाने बुझाने पर उन्होंने इस शर्त के साथ पिस्तौल अप्पा साहब को वापस की कि इसके बदले में उत्तर प्रदेश सरकार एल्फ्रेड पार्क में स्थित चंद्रशेखर आज़ाद की मूर्ति की एक फोटो के साथ धन्यवाद का एक पत्र भेजे। इस प्रकार वह पिस्तौल 1972 के प्रारम्भ में इंग्लैण्ड से दिल्ली और वहां से फिर लखनऊ लायी गयी। 27 फरवरी 1973 को उस पिस्तौल को लखनऊ के गंगाप्रसाद मेमोरियल हॉल के सामने एक सुसज्जित वाहन पर शीशे के बंद बक्से में रखा गया, जिसकी रक्षा के लिए दोनों तरफ इन्स्पेक्टर रैंक के दो पुलिस अधिकारी तैनात थे। वहां से हज़ारों की संख्या में विशाल जुलूस कैप्टन रामसिंह के बैंड के साथ मार्च करता हुआ निकला। जुलूस में भारतवर्ष के लगभग 450 वयोवृद्ध क्रांतिकारी पैदल चलकर लखनऊ संग्रहालय पहुँचे। वहीँ संग्रहालय के प्रांगण में काकोरी काण्ड के प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ बख्शी की अध्यक्षता में विशाल जनसभा संपन्न हुयी। सभा के पश्चात मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के अस्वस्थ होने के कारण उनके प्रतिनिधि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री बेनीसिंह अवस्थी ने ससम्मान लखनऊ संग्रहालय को वो कोल्ट पिस्तौल भेंट की। कई वर्षों तक वह पिस्तौल लखनऊ संग्रहालय में ही रही और जनता पार्टी के शासन के समय में जब इलाहबाद का नया संग्रहालय बनकर तैयार हुआ, तब लखनऊ से इलाहाबाद ले जाकर संग्रहालय के विशेष कक्ष में रखी गयी, जिसे आज भी वहाँ देखा जा सकता है। साभार जनार्दन मिश्र जी की वाल से...


गाज़ीपुर/उत्तर प्रदेश।
अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला... मल्ल शिरोमणि स्व मंगला राय के कुछ संस्मरण। मैंने सुना था कि उनके पास दारा सिंह का फिल्मो में काम करने हेतू प्रस्ताव आया था उस समय पहलवानी से सेवानिवृत्त होने के बाद की आर्थिक कठिनाईयों से बचने हेतु किन्तु उसे अपने अभिभावकों (प्रमुख रूप से अपने चाचा स्व राधा राय जी )के नाराजगी के भय से ठुकरा दिया क्योंकि सिनेमा और पहलवान एक नदी के दो किनारे मानें जाते थे उस समय ।तस्वीरो को देख के नई पीढ़ी शायद आश्चर्य करें कि ऐसे भी इंसान सही में होते थे क्या? आगे पढें मंगला राय के भतीजे श्री तारकेश्वर राय जी के शब्दों में- मेरा यह संस्मरण पिछले साल काका की मूर्ति अनावरण के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में छपा था ! मूर्ति का अनावरण मेरे गाँव में माननीय सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त ने माननीय मनोज सिन्हा जी सांसद और माननीया अलका राय विधायक की उपस्थिति में किया था ! - - - मंगला काका - - मुझसे अनुरोध किया गया है कि काका के बारे में कुछ लिखूं ! उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि सब विकिपीडिया पर उपलब्ध है ! नहीं उपलब्ध है तो उनके व्यक्तिगत संस्मरण जो मात्र हम लोगों की ही अमूल्य निधियां हैं ! उनकी मल्ल कला के बारे में भी मुझे बहुत कुछ ज्ञात था परन्तु वह सब पिताजी द्वारा बताया हुआ था ! इस बारे में मैंने सन 1950 में ही जब मैं दर्जा छह का विद्यार्थी था तो अपने पिताजी ( जो उनकी प्रत्येक बड़ी कुश्ती के प्रत्यक्षदर्शी थे ) द्वारा सुनकर एक बड़ा लेख भूमिहार ब्राह्मण स्कूल ( अब झारखंडे महादेव स्कूल ) की पत्रिका में लिखा था ! उसमें उनकी सभी कुश्तियों का प्रथम्दृश्या वर्णन था ! परन्तु अब उसकी याद नहीं है ! हाँ उनके साथ बिताये अमूल्य समय की स्मृतियाँ हैं सो भी उम्र के साथ धुंधली पड़ती जा रही हैं ! मैं दर्जा नौ में था ( सन 1953 )! काका की प्रसिद्द पहलवान ग़ुलाम गौस पर विजय वाली अंतिम कुश्ती बनारस में ईश्वरगंगी के पोखरे पर हो चुकी थी और वे सदा के लिए गाँव आ गए थे ! गर्मी की छुट्टियों में प्रत्येक दोपहर और शाम को मेरी उनके साथ शतरंज की बाजी होती थी ! दोपहर में उनके दुवार की खम्भिया में और शाम को काशी के बेदा पर ! मैं उस समय नौसिखुवा ही ( काका ने ही सिखाया था ) परन्तु कुछ दिन बाद ही इतना सीख गया था कि उनको चुनौती तो नहीं पर खेल का आनंद देने लगा था ! बाद में जब मैं काशी विश्वविद्यालय गया और छात्रावास में भी शतरंज खेलने लगा तो गाँव आने पर उनको कड़ी टक्कर देने लगा ! परन्तु मुझे यह कहते हुए किचित भी संकोच नही कि मैं उनसे कभी भी जीत नहीं सका ! पुराने लोग जो कहते हैं कि स्वस्थ देह में ही स्वस्थ मष्तिष्क होता है सो झूठ नहीं! ऐसे ही उनका संगीत प्रेम भी था ! खेलते समय वे कुछ न कुछ गुनगुनाया करते थे ! उनकी एक ठुमरी मुझे आज तक याद है ! “ मुरलिया कौने गुमान भरी ! रूख तोर जानत जड़ पहिचानत, जंगल की लकड़ी ” ! गला भी कमाल का ! अनेक कलावन्तों से भी उनका व्यक्तिगत परिचय था ! मुझे याद है प्रसिद्द पद्मश्री ( कालांतर में पद्मविभूषण ) सिद्धेश्वरी देवी उनके गदा की पूजा में जोगा आई थीं ! उनके साथ प्रसिद्द तबलावादक पंडित अनोखे लाल मिश्र संगत कर रहे थे ! ऐसे ही शिवमूर्ती बहन की शादी हुई तो प्रसिद्ध नर्तक पद्मश्री शंभू महाराज नेवता पर आये थे ! हाँ, एक बात और ! उनका भतीजा होने का लाभ अपने सेवाकाल में मैंने अक्सर लिया ! आजमगढ़ में सुखदेव पहलवान और गोरखपुर में ब्रह्मदेव पहलवान के अखाड़े पर मैं जाया करता था और कर्मचारियों में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ती थी ! ये दोनों प्रसिद्द पहलवान मेरे गाँव पर महीनों रह कर रियाज़ कर चुके थे ! स्मृतियाँ समाप्त नहीं होंगी ! धीरे धीरे याद आती हैं ! इसलिए विदा (यह उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन से सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक आदरणीय Tarkeshwar Rai के संस्मरण हैं)...


नई दिल्ली / मध्यप्रदेश/जबलपुर।
उस दौर में कॉफ़ी हॉउस शहर का मूड तय किया करता था अब न वे बुद्धिजीवी रहे और न वह सेंटर टेबिल -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी दो - तीन दिन पहले व्हाट्स एप पर मेरे द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के दौरान कागज पर टाईप किये हुए एक चार्ट को देखकर उसे पढ़ने का प्रयास किया तो आश्चर्य हुआ कि उसमें जबलपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे इंडियन कॉफी हॉउस के मोबाईल नम्बर के साथ सूचना थी कि 19 मई से उनके द्वारा पार्सल की होम डिलीवरी शुरू की जा रही है | शायद लम्बे लॉक डाउन के कारण हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें होम डिलीवरी शुरू करने पर मजबूर होना पड़ा | अभी कुछ दिन पहले ही मित्रवर Lakshmikant Sharma के एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने कॉफी हॉउस प्रबन्धन के मुखिया ओ.के. राजगोपाल का दर्द बयाँ करते हुए बताया कि इस सहकारी संस्था द्वारा मप्र और छत्तीसगढ में संचालित 81 और देश भर में 142 कॉफ़ी हॉउस बंद रहने से भारी नुकसान हो रहा है | इंडियन कॉफ़ी हॉउस का नाम आते ही एक पूरा अतीत मानस पटल पर उभर आता है | सत्तर - अस्सी के हलचलों से भरे हुए उन दशकों में जब जबलपुर की राजनीति के समानांतर छात्र राजनीति ने भी अपने पाँव मजबूती से जमा लिए थे , इंडियन कॉफ़ी हॉउस में ही शहर और जिले का मूड तय होता था | छात्र नेताओं के साथ राजनीतिक पार्टियों के लोग , प्राध्यापक , लेखक , पत्रकार , श्रमिक नेता और इन सबके अलावा कुछ अघोरी किस्म के लोग सुबह से रात तक इसकी कुर्सियों पर नजर आया करते थे | शहर के बीचों - बीच वाले करमचन्द चौक के कॉफ़ी हॉउस में घुसते ही जो सेंटर टेबिल थी वह बुद्धिजीवियों के उच्च सदन जैसी थी जिसकी बगल से गुजरते हम जैसे नए - नवेले वहां आसीन अनजाने व्यक्ति को भी अभिवादन करते हुए किसी दूर वाली टेबिल पर जाकर बैठते थे | वह सेंटर टेबिल थी ही ऐसी जगह जिस पर बैठे वरिष्ठजन संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों की तरह हर आने - जाने वाले पर नजर रखते थे | उस टेबिल पर रखीं एश ट्रे से धुंआ भी बिना रुके निकलता रहता था | कॉफ़ी हॉउस से मेरा भावनात्मक लगाव इसलिए था क्योंकि मैंने छुरी - कांटे का प्रयोग करते हुए डोसा खाने और फिल्टर कॉफ़ी की शुरुवात यहीं से की थी | उस समय करमचन्द चौक के अलावा कैंट (सदर) में दूसरा कॉफ़ी हाउस था जिसका हॉल किसी राजमहल के भोजन कक्ष का एहसास करवाता है | कालान्तर में शहर के विभिन्न हिस्सों में उसकी शाखाएं खुलती चली गईं और अच्छा व्यवसाय भी कर रही हैं | लेकिन मैं जिस दौर के इंडियन कॉफ़ी हॉउस की बात कर रहा हूँ उसमें सही मायनों में भारत के बहुलतावादी समाज का असली रूप नजर आता था | कोलकाता के जिस भद्रलोक की बात करते हुए दुनिया भर में कहीं भी रहने वाला आम बंगाली आत्मगौरव की अनुभूति से भर उठता है , वही एहसास बेरोजगारी के उन दिनों में दो - तीन मित्रों को महज 4 - 5 रूपये खर्च करने के बाद हो जाता था | और यदि केवल कॉफ़ी में निबट आये तो पैसे बच भी जाते थे | दरअसल वहां चारों तरफ जो विभूतयां बैठा करती थीं उनके सामने आना - जाना ही अपने आप में महत्वपूर्ण था | उस दौर में बुद्धिजीवी ही नहीं सार्वजानिक संपर्कों में रूचि रखने वाले अनेक रईस लोग भी वहां आया करते थे | पुलिस के गुप्तचर विभाग का भी कोई न कोई करमचन्द चौक कॉफ़ी हॉउस में किसी कोने में हर समय बैठा होता था क्योंकि शहर का माहौल तो वहीं से बनता - बिगड़ता था | कुछ दूर स्थित मालवीय चौक छात्र नेता से राष्ट्रीय स्तर के नेता बने शरद यादव का अड्डा था | इसलिए भी उस कॉफ़ी हॉउस में चैतन्यता महसूस होती थी | वैसे दक्षिण भारतीय व्यंजनों के कुछ और छोटे कैफे भी शहर में थे लेकिन कॉफ़ी हॉउस का माहौल ही उसकी ख़ूबसूरती थी | उसका आकर्षण इतना जबरदस्त था कि जबलपुर से बाहर जाने पर यदि कहीं कॉफ़ी हॉउस का बोर्ड दिख जाता तो बिना कॉफ़ी पीने की इच्छा के भी वहां जाए बिना नहीं रहते | 1977 में मैं अपने दो मित्रों के साथ कश्मीर गया | श्रीनगर का लाल चौक उन दिनों देर रात तक गुलजार रहता था | वहां शर्मा जी के वैष्णों होटल में हम लोग रात का भोजन करते क्योंकि दिन तो घूमने में गुजरता था | लेकिन जिस गेस्ट हॉउस में ठहरे उसमें नाश्ता घिसा - पिटा बटर टोस्ट और चाय ही थी | एक रात लौटते समय लालचौक पर पहली मंजिल में इंडियन कॉफ़ी हॉउस का साइन बोर्ड दिख गया | उसे देखकर मानों मन की मुराद पूरी हो गई और जब तक श्रीनगर में रुके सुबह का नाश्ता कॉफ़ी हॉउस में ही हुआ | उस दौर के नेता भी किसी सितारा होटल के बजाय कॉफ़ी हॉउस में बैठना पसंद करते थे | मैंने सुन रखा था कि दिल्ली के कनाट प्लेस के कॉफ़ी हॉउस में दिग्गज नेताओं की बैठक थी | मैं भी एक दो बार वहां गया किन्तु संयोगवश नेताओं में से कोई नजर नहीं आया | एक दौर था जब देश की वामपंथी और समाजवादी राजनीतिक धारा इंडियन कॉफ़ी हॉउस से ही बहती थी | यहाँ बैठने वाले साधारण व्यक्ति या मुझ जैसे छात्र में भी बौद्धिक श्रेष्ठता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता था | इस संस्थान के छोटे- बड़े कर्मचारी ही इसके मालिक होते हैं क्योंकि यह सहकारिता के आधार पर संचालित है | हर जगह एक सा फर्नीचर , साधारण किस्म के कप प्लेट , वेटर्स का अत्यंत मृदु व्यवहार , ताजी खाद्य सामग्री , हमेशा एक सा स्वाद और सबसे बड़ी बात उस ज़माने में ये थी कि जेब खाली होने पर भी वहां घंटों बैठा जा सकता था | एक टेबिल यूँ तो चार व्यक्तियों के लिए थी लेकिन संख्या बढ़ने पर टेबिल से टेबिल सटाकर क्षमता बढ़ाने की स्थायी सुविधा होती थी | एक तरह से इंडियन कॉफ़ी हॉउस उस समय एक अड्डा हुआ करता था लोगों से मिलने - जुलने , बतियाने और सामाजिक निकटता बढ़ाने का | कुछ ऐसे भी लोग उसमें आया करते थे जो अकेले ही होते और एक कॉफ़ी पीकर चले जाते | वहीं कुछ का समय तय होता जब वे मित्रमंडली सहित वहां आते और निश्चित समय तक बैठकर लौट जाते | जबकि कुछ ऐसे कॉफ़ी हॉउस प्रेमी भी रहे जो सुबह उसका दरवाजा खुलने से पहले ही आकर बाहर खड़े हो जाते | शहर के अनेक लोगों का पता ठिकाना c/o कॉफ़ी हाउस होता था | नियमित आने वालों के लिए लोग वहां सन्देश भी छोड़ जाते थे | इस प्रकार उस दौर का इंडियन कॉफ़ी हॉउस साधारण और असाधारण दोनों किस्म के लोगों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक चिन्ह हुआ करता था | उसकी सादगी में ही उसकी संपन्नता झलकती थी | फर्श पर साधारण जूट मैट और बेहद सादी क्रॉकरी तथा फर्नीचर उसकी प्रतिष्ठा में आड़े नहीं आये क्योंकि उनका उपयोग करने वालों में नामी - गिरामी हस्तियाँ जो होती थीं | लेकिन बीते एक डेढ़ दशक में कॉफ़ी हॉउस अपने उस परम्परागत स्वरूप और पहिचान को बरक़रार नहीं रख सके | कुछ में होटल भी साथ जुड़ गये | दक्षिण भारतीय के अलावा भी वहां अन्य व्यंजन उपलब्ध हैं , थाली सिस्टम भी आ गया | अधिकतर कॉफ़ी हाउसों में अब पहले जैसा बौद्धिक समागम कभी - कभार ही दिखता है | हालांकि ऐसे अनेक मित्र हैं जो आज भी कॉफ़ी हॉउस जाये बिना नहीं रह सकते | मैं भी करमचंद चौक वाले कॉफ़ी हॉउस में यदा - कदा चला जाता हूँ लेकिन उसका पूरा आकार - प्रकार ही उलट - पुलट हो गया | यद्यपि अब वहाँ परिवार सहित आने वाले बेतहाशा बढ़ गये हैं लेकिन जिस सेंटर टेबिल का जिक्र मैंने किया वह इतिहास बन गयी है | कैंट ( सदर ) वाले कॉफी हॉउस में भले ही ज्यादा बदलाव नहीं हुआ लेकिन अब वह रेस्टारेंट ज्यादा लगने लगा है | जिस वजह से वहां होने वाला एहसास भी गुम होकर रह गया | शायद बदलते समय की जरूरतों और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण कॉफ़ी हॉउस में भी बदलाव हुए , लेकिन जिस तरह बीते जमाने की सुपर हिट ब्लैक एंड व्हाईट क्लासिक फिल्म को रंगीन बनाकर दोबारा प्रदर्शित किये जाने पर भी वह अपने दौर के दर्शकों तक को नहीं खींच सकीं , वही मुझे कॉफ़ी हॉउस के मौजदा स्वरूप को देखकर प्रतीत होता है | यद्यपि आज भी वहां का स्वाद और कर्मचारियों का संस्कार अपरिवर्तित है किन्तु अड्डेबाजी वाला वातावारण और उसकी रौनक बने रहने वाली शख्सियतें उस ज़माने जैसी तो नहीं दिखतीं | बावजूद इसके अनेक बुद्धिजीवी आज भी वहां जाने का मोह नहीं छोड़ सके लेकिन अब इन्डियन कॉफ़ी हॉउस शहर की हवा का रुख तय नहीं करता | और यही कमी कम से कम मैं तो महसूस करता हूँ।...


नई दिल्ली / मध्यप्रदेश।
तुझसे था पहले का नाता कोई , यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई जीवन के बाद भी रिश्तों का निर्वहन -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी चाची जी 85 पार कर चुकी थीं | संघर्षपूर्ण जीवन के बाद जब इंसान के आराम के दिन आते हैं तभी बीमारी का पिटारा भी साथ हो लेता है | पता चला वे अस्पताल में भर्ती हैं और मुझे याद कर रही हैं | शाम को मैं पत्नी के साथ उन्हें देखने गया तो बोलीं दिव्या ( मेरी बेटी ) के बेटे को नहीं लाये | मैं लगातार कह रही हूँ कि उसे देखने की इच्छा है लेकिन सब कह देते हैं वो चंडीगढ़ में है | मैंने उनके पास जाकर कहा कि जी यही सच है | और फिर उन्हें खुश करने के लिए कह दिया खबर भेज दी है , जल्दी आ जाएगा | दैवयोग से वे स्वस्थ होकर घर लौट आईं लेकिन बीमारी धीरे - धीरे शरीर को क्षीण करती जा रही थी | बेटे - बहू , पोते - पोती सभी हरसंभव सेवा में जुटे थे | वैसे उनसे मेरा कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था | वे कायस्थ और हम ब्राह्मण लेकिन खून के रिश्ते हों तभी निभते हैं , ये सोचना गलत है | उनसे नाता 1956 में तब जुड़ा जब हमारा परिवार नागपुर से जबलपुर आया | साठिया कुआ मोहल्ले में जो मकान किराये पर पिता जी ने लिया वह पहली मंजिल पर था जिसके नीचे यही कायस्थ परिवार रहता था | इस तरह नये शहर में पहला परिचय उन्हीं से हुआ | धीरे - धीरे मेरी माता जी और चाची जी में बहिन जैसा रिश्ता बन गया | मेरी छोटी बहिन ( अब स्व. ) कुछ समय ग्वालियर में मेरी बड़ी मौसी जी के पास रही | उसी दौरान रक्षाबन्धन आया और तब चाची जी ने मुझे बुलाकर अपनी बेटी से राखी बंधवाकर रिश्ते को और मजबूत कर दिया | उनके पति रक्षा संस्थान में कार्यरत थे और वे स्वयं एक निजी स्कूल में शिक्षिका थीं | हम दो भाई एक बहिन की तरह उनके परिवार में भी दो पुत्र और एक मुझे राखी बांधने वाली बेटी थी | सब कुछ ठीक चल रहा था | हम लोग ग्रीष्म अवकाश में ग्वालियर गये हुए थे | एक दिन पिता जी का पत्र आया जिसमें चाची जी पर हुए वज्राघात का समाचार था | उनके पति अचानक चल बसे | मुझे उस समय तक इतनी दुनियादारी नहीं आती थी | इसलिए उस घटना की गम्भीरता को नहीं समझ सका किन्तु जब जबलपुर लौटे और चाची जी को देखा तब इतना तो लगा कि उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था | तीन छोटे बच्चे और प्रायवेट स्कूल की मामूली नौकरी | पति की पेंशन भी उस जमाने में बहुत ही कम थी | और यहीं से उनकी संघर्ष यात्रा शुरू हुई | चूँकि वे और मेरी माता जी एक दूसरे के बेहद निकट थीं इसलिए उनमें भी हमें माँ ही नजर आती थी | समय के साथ हम सब बड़े हो गये | उनके दोनों पुत्र भी नौकरी में आ गये | बेटी भी शिक्षिका बन गयी | सबके यथा समय विवाह भी हो गये | फिर जब साठिया कुआ छोड़ने का मन बना तब हम दोनों ने एक नई आवासीय कालोनी में अगल - बगल प्लाट खरीदे | मेरा घर तो बन गया किन्तु वे नहीं बनवा सकीं | इस तरह 27 साल बाद पड़ोस छूटा लेकिन रिश्तों में वही गहराई और मिठास बनी रही | बाद में हमारे वर्तमान निवास वाली कॉलोनी विकसित हो रही थी तब हम दोनों ने वहां भी आमने - सामने प्लाट खरीदे | यहाँ उनका घर पहले बन गया जबकि मैं कई बरस बाद इस जगह रहने आ सका | जब माँ और चाची जी फिर एक ही मोहल्ले में साथ हुईं तो वे बोलीं चलो आख़िरी समय तो साथ - साथ कटेगा | एक दिन तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ने पर अपने पूरे परिवार के सामने माता जी से बोलीं सुनो , मेरे मरने पर मुंह में गंगाजल तुम ही डालोगी | माता जी ने उनसे कहा कि इस तरह की बात क्यों बोल रही हो तब उन्होंने केवल ये कहा , मेरी इच्छा है | 2013 में मेरे नाती दिव्यांश का जन्म हुआ जिसे देखकर वे भी बहुत खुश थीं | कुछ समय बाद बेटी अपने घर चंडीगढ़ चली गई | और उसी के बाद वे गम्भीर रूप से अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती होने पर उस नाती को देखने की जिद करने लगीं | हालांकि ठीक होकर वे घर तो आ गईं किन्तु मैं जब भी मिलता तब वे दिव्या के बेटे से मिलवाने की जिद करतीं और मैं शीघ्र मिलवाने का आश्वासन देकर लौट आता | कुछ महीने बाद नाती का अन्नप्राशन था | उसे लेकर बेटी , दामाद , समधी , समधिन भी आये | जिस दिन घर में पूजन एवं कथा थी उसके दो दिन पहले से चाची जी गम्भीर हो गईं | डाक्टरों ने घर पर ही सेवा करने कहकर संकेत दे दिया | उनकी चेतना धीरे - धीरे कमजोर हो रही थी | अचानक मेरा नाम लेकर बोलीं उसे बुलाओ और मैं पहुंचा तो फिर वही फरमाइश कि दिव्या का बेटा आ गया तो उसे मेरे पास लाओ | मैं उनके अचेतन मन से निकली इच्छा को समझकर तुरंत घर लौटा और दिव्या से कहा ऐसा लगता है चाची जी की अंतिम इच्छा इस बच्चे को देखने की है | इसलिए देर मत करो | बेटी तत्काल छह माह के अपने पुत्र को लेकर गई और उनके पास जाकर कहा लो दादी मैं आ गयी | वे आँखें खोलते हुई धीमी आवाज में बोलीं , मैं तो कहती थी कि ये आ गया लेकिन कोई बुलाता ही नहीं था | कुछ देर बच्चे को निहारकर फिर अचेतन हो गईं | दिव्या बहुत भरे मन से लौट आई | रात भर जैसे - तैसे बीती | उनकी एक पोती खुद भी डॉक्टर हो गई थी | अतः जो किया जा सकता था , किया जाता रहा | मैंनें रात को पंडित जी को फोन पर स्थिति समझाते हुए सुबह जल्दी आकर अन्नप्राशन विधान एवं कथा सम्पन्न करवाने का निवेदन कर दिया था | अगले दिन धार्मिक अनुष्ठान के बीच मैं उनकी जानकारी लेता रहा | कथा सम्पन्न होने पर पंडित जी सहित सभी सम्मानीय रिश्तेदारों द्वारा भोजन करने के उपरान्त परिवारजनों ने भी भोजन प्रसाद ग्रहण किया | और इतने में ही वह खबर आ गई जिसकी आशंका थी | दिव्यांश ने जीवन में खीर के तौर पर पहली बार अन्न चखा था | सभी इस संस्कार के बाद उसे दुलार रहे थे लेकिन महीनों से उसकी प्रतीक्षा कर रहीं चाची जी चली गईं | दिव्यांश को देखने की उनकी इच्छा तो बीती रात ही पूरी हो चुकी थी किन्तु उसके जीवन के इस महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य के सम्पन्न होने तक उनका बना रहना भी इच्छा मृत्यु का उदाहरण नहीं तो और क्या था ? दूसरे दिन उनका अंतिम संस्कार हुआ | मेरी माँ का दुःख हम सभी समझ सकते थे | हमारे घर से चाची जी का घर 100 फीट से भी कम दूर नहीं है लेकिन माँ चलने में असमर्थ थीं और उतनी दूर उन्हें कार से ले जाना पड़ा | ज्योंहीं वे पहुंचकर सिसकने लगीं त्योंही परिजनों ने गंगाजल का पात्र उनके हाथ में देकर कहा अम्मा का आदेश था कि उनके मुंह में गंगाजल आप ही डालेंगी | माता जी उनसे कुछ छोटी थीं लेकिन छः दशक से भी ज्यादा की अंतरंगता के बाद इस तरह उन्हें विदा करते हुए उनके हाथ कांप रहे थे | चाची जी का अपना भरा पूरा परिवार है किन्तु मुंह में गंगा जल डालने की जिम्मेदारी माता जी को सौंपकर वे दिखा गईं कि रिश्ते जीवन के साथ ही नहीं , जीवन के बाद भी किस तरह निभाए जाते हैं | दोनों परिवारों के बीच स्नेह बन्धन यथावत है | चाची जी के नहीं रहने के बाद भी उनके परिजन पिता जी और माता जी के पास आकर सम्मान देते रहते हैं | हर भाई दूज और राखी पर मैं बहिन के घर जाना नहीं भूलता | लेकिन रह - रहकर मेरे मन में दो बातें उठती रहती हैं कि चाची जी ने माता जी को ही गंगा जल पिलाने का वह दायित्व सौंपा और दिव्यांश को देखने की इच्छा तथा फिर उसके अन्नप्राशन के विधि - विधान से पूर्ण होने होने तक ये संसार नहीं त्यागा | वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर इसमें कुछ भी असमान्य नहीं है लेकिन भावनात्मक दृष्टि से देखने पर लगता है कि इंसान को केवल साँसें ही नहीं अपितु रिश्ते भी जीने की शक्ति देते हैं | माता जी कहने को केवल उनकी पड़ोसी थीं जिनसे निकट सम्बन्ध बन जाना अनोखी बात नहीं थी | ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जायेंगे किन्तु उनके हाथों से गंगा जल ग्रहण करने की उनकी इच्छा और फिर दिव्यांश को देखने तक उनका जीवित बने रहना महज संयोग नहीं हो सकता | ऐसा लगता है इस तरह के सम्बन्ध पिछले जन्मों से जुड़े होते हैं | जिन्हें केवल महसूस करते हुए जिया और निभाया जा सकता है | अत्यंत विषम परिस्थितियों में उन्होंने जिस साहस और स्वाभिमान के साथ ज़िन्दगी गुजारी उसे मैंने निकट से देखा था | इसलिए मेरी पीढ़ी तक से उनका लगाव समझ में आता है | लेकिन जीवन के अंतिम क्षणों में और दो पीढ़ी बाद के नन्हें से बच्चे को देखकर ही प्राण त्यागने की उनकी इच्छाशक्ति के पीछे पिछले किसी जन्म का कोई सम्बन्ध था या कुछ और ये मैं आज तक नहीं समझ सका | आज जब खून के रिश्तों में दरारें आते देर नहीं लगतीं तब इस तरह के सम्बन्ध कैसे बनते और पीढ़ी दर पीढ़ी निभते हैं ये जाते - जाते चाची जी सिखा गईं |...