नई दिल्ली/लखनऊ ।
कार्यक्रम के बहाने विवेकानंद -------------------------------- सभागार में मैं ही सबसे बुजुर्ग था । कार्यक्रम विवेकानंद जयंती के नाम पर था। सोच रहा था- स्‍वामी विवेकानंद के नाम पर कार्यक्रम तो बहुत होते हैं , जयंती पर खास कर , हर साल। लेकिन , क्‍या कभी हमने ईमानदारी से यह हृदयंगम करने का प्रयास किया है कि आखिर वे कहना और करना क्‍या चाहते थे ? करीब सवा सौ साल बाद भी वे क्‍यों यूथ आइकॉन और आकषर्ण -केन्‍द्र बने हुए हैं? 42-44 साल पहले इंटर और इलाहाबाद विवि में बीए करते समय स्‍वामी विवेकानंद मेरेे भी आदर्श थे। ढूंढ - ढूंढ कर उनका और उन पर कितना ही साहित्‍य चाटा था । स्‍वामी रामतीर्थ का भी। दोनों के प्रति बडा आस्‍थामयी आकर्षण - भाव था। संन्‍यासी होने के बारे में भी सोचता था । लेकिन विपरीत हवा के झोंके ऐसा उडाते गये कि फिर जमीन नहीं मिली। तो क्‍या वे संन्‍यासी थे , अंग्रेजीदां थे और अमेरिका -यूरोप में हिंदू धर्म के झंडे गाडे थे , इस लिए महनीय हैं ? संन्‍यासी तो उनके पितामह दुर्गा चरण दत्‍त भी थे , उन्‍होंनें भी लगभग विवेकानंद की आयु में संन्‍यास लिया था । अंग्रेजी के साथ ही फारसी भी पढे थे । अपने नवजात पुत्र (विवेकानंद के पिता विश्‍वनाथ दत्‍त) का मुख देख कर 25 वर्ष की आयु में संन्‍यासाश्रम में गये तो फिर नहीं लौटे। विरासत में मिली विपुल सम्‍पत्ति छोड कर , विवेकानंद (तब नरेन्‍द्रनाथ दत्‍त ) तो जब संन्‍यासी बने तो उनका घर कर्ज में डूबा और सामान्‍य निर्वहन की समस्‍याओं से घिरा था । संन्‍यासी तो स्‍वामी रामतीर्थ भी थे , अंग्रेजी जानने वाले और लाहौर के डिग्री कालेज में गणित के प्रोफेसर । नौकरी और युवा पत्‍नी , दो छोटे बेटे और एक बेटी को छोड कर 25 वर्ष की आयु में संन्‍यास - दीक्षा ले ली थी। जापान के विश्‍व धर्म सम्‍मेलन में गये थे , अमेरिका भी दो साल रहे थे ।लौटते समय विश्‍व प्रसिद्ध इस्‍लामी इदारे अलअजहर यूनिवर्सिटी ने उनका लेक्‍चर भी कराया था। यह सम्‍मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। विवेकानंद का वैशिष्‍ट्य था , लोक दु:ख से अनुप्राणित हाेना । वे मोक्ष कामना से नहीं , पीडित-शोषित अभाव ग्रस्‍त भारतीय जनता के कल्‍याणार्थ कर्मयोगी बने थे। 'दरिद्र नारायण' का वाक्‍यांश उन्‍हीं का दिया है। गोस्‍वामी तुलसीदास ने कहा है - निज परिताप द्रवहि नवनीता। परदुख द्रवहिं संत सुपुनीता ।। संत दूसरे के दु:ख के ताप से पिघलता है। गौरवशाली अतीत वाले देश की प्राय: हजार साल की गुलामी , शरिया के बाद अंग्रेजों का शासन । दस फीसदी लोग ही शिक्षित , शेष अनपढ । इतने ही पैसे वाले , बाकी पशु से भी बदतर हालत में । भरपेट भोजन नहीं , कपडे नहीं, आवागमन के साधन नहीं, चिकित्‍सा नहीं , सुरक्षा - सम्‍मान नहीं। घोर जातिवाद , छुआछूत में कसमसाता समाज । स्त्रियों की हालत तो और दयनीय ,बच्‍चे पैदा करने की मशीन , अधिकार विहीन। भारत की इस दरिद्रता ने विवेकानंद की आंखों से नींद छीन ली। उन्‍होंने कहा , यदि इसे दूर करने के लिए मैं मोक्ष- मुक्ति की अपेक्षा कई जन्‍म लेना पसंद करूंगा। इस दरिद्र नारायण की सेवा और भारत के पुराने गौरव की पुनर्स्‍थापना के लिए उन्‍होंने स्‍वयं को झोंक दिया । अहर्निश , अनथक परिश्रम, लेखन , लेक्‍चर , बुद्धिजीवियों ख्‍यातिलब्‍ध लोगों से मिलने और समर्पित सेवाभावी शिष्‍यों का संगठन खडा करने में दिन-रात मेहनत की । इसी परिश्रमाधिक्‍य ने उनके शरीर को बीमार बना दिया और 40वां जन्‍म दिन आने से पहले ही वे अगली महायात्रा को निकल गये। वे करीब 27 साल की उम्र में भारत भ्रमण पर निकले , बिना नाम- पहचान के ,बिना किसी संगी-साथी के, मांगते-खाते। कई दिन हो गये थे धूम्रपान किये हुए । अछूत मानी जाने वाले एक बस्‍ती से गुजरते हुए एक ब्‍यक्ति को तंबाखू पीते देखा तो तलब लग आयी। मन कडा कर आगे बढे ,फिर लौटे । तंबाखू पीने को मांगी , वह ब्‍यक्ति घबडा गया । कहा ,महाराज यह आप क्‍या कह रहे हैं ? मैं अछूत जाति का , लोग देखेंगे तो क्‍या कहेंगे ? लेकिन , वे क्रांतिधर्मी साधु थे , गरीबों, अछूतों में नारायण के दर्शन करते थे, स्‍वयं को उनके बीच पाते थे। उनकी बस्तियों में भी रुक जाते थे। जोर देने पर उस ब्‍यक्ति ने अपनी चिलम धो कर तंबाखू पीने को दी । उसे धन्‍यवाद कर आगे बढे, गुजरात , महाराष्‍ट् , राजस्‍थान आदि होते हुए 1892 ई. को सुदूर दक्षिण रामेश्‍वरम पहुंचे ।सुना तो शिकागो विश्‍व धर्म सम्‍मेलन में जाने का निश्‍चय किया । नारंगी रंग का अंगरखा , पीली पगडी का चुनाव किया और अपना नाम करण किया , विवेकानंद। पहली विदेश यात्रा , किन विषम पस्थितियों और कठिनाईयों में सम्‍मेलन सम्मिलित हुुुए और कैसे अमेरिका में वेदांत -दर्शन की यशोपताका फहराई , यह अलग लंबी कहानी है। तब वे तीस वर्ष के थे और सर्वधर्म संसद में भाग लेने वालों में सबसे युवा । अमेरिका , इंग्‍लैंड घूम कर चार साल बाद लौटे तो देश ब्‍यापी नाम-ख्‍याति , सम्‍मान और अमेरिका - इंग्‍लैंड के शिष्‍य- शिष्‍याओं के साथ। वहां वेदांत समितियां गठित कर । प्राय: इसी उम्र में , उनसे करीब पांच सौ साल पहले लोक दु:ख के निवराणार्थ परम संत नानक उदासियों में निकले थे। देश में तब इस्‍लामी शासन था , वे काबा, मदीना , बगदाद आदि प्रमुख इस्‍लामी नगरों में गये थे। दसवें नानक गुरू गोबिंद ने तत्‍कालीन परिस्थितियों की मांग के अनुरूप देश- धर्म बचाने को खालसा का सृृृृजन किया था , स्‍वामी विवेकानंद जाग्रत विवेक वाले सेवाभावी संन्‍यासियों की टीम खडा करने में लगे। बेलूर मठ और रामकृष्‍ण मिशन की स्‍थापना इसी के क्रम थी । महा भारत कहता है - न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा:। न सा वृद्धये यो न बदति धर्मम्। न सा धर्मो यत्र न सत्‍यमस्ति । न तत् सत्‍यं यच्‍छलेशनुविद्धम्।। जहां वृद्ध पुरुष न हों , वह सभा सभा नहीं है, वे वृद्ध वृृृद्ध नहीं हैं जो धर्म की बात न बतावें , वह धर्म नहीं है जिसमें सत्‍य न हो और वह सत्‍य नहीं है जो छल से युक्‍त हो। उनके गुरू स्‍वामी राम कृष्‍ण परमहंस का सम्‍यक स्‍मरण किये बिना विवेकानंद को याद किया और समझा नहीं जा सकता । स्‍वामी रामकृष्‍ण के बिना उद्धत, उर्वर और तर्क आग्रही युवा शायद नरेन्‍द्रनाथ दत्‍त ही रह जाते , विवेकानंद के रूप में उनका रूपांतरण न हो पाता । और , रानी रासमणि का भी कृतज्ञ स्‍मरण जरूरी है। हमारा समाज कितना स्‍वार्थी और एकाग्रही है। विवेकानंद याद किये जाते हैं , उनके गुरू नहीं, उनका साधाना पथ सरल बनाने वाली जमींदारिनी रासमणि नहीं । तन,मन ,धन समर्पित कर मुहम्‍मद की राहें आसान बनाने और उन्‍हें पैगम्‍बर के रूप में सर्व प्रथम मान्‍यता देने वाली बीबी खदीजा भी तो भुला दी गयीं , रसूल ही याद रहे। अपना पति , पुुुत्र, पौत्र और स्‍वयं भी सिख पंथ के लिए मूक आधार बन आत्‍मोत्‍सर्ग करने वाली माता गूजर कौर भी कहां याद आती हैं ? रानी रासमणि ने एक अंग्रेज से उसका बडा बागीचा खरीद कर और लाखों रुपये खर्च कर दक्षिणेश्‍वर का काली व शिव मंदिर बनवा कर रहने -खाने निर्विघ्‍न -निश्चिंत प्रबंध न किया होता तो संभव है पं. गदाधर चटर्जी गांव में ही घूमते रह जाते । उनके रामकृष्‍ण परमहंस बनने और अवतार कहे जाने तक की यात्रा में रासमणि का ही प्रमुख योगदान है, जो धन के समाज सेवा के कामों में लगाने की प्रतीक हैं , जिन्‍हें शूद्रा मान कर ब्राह्मण उनके मंदिर का पुजारी बनने से बच रहे थे। अल्‍प शिक्षित स्‍वामी रामकृष्‍ण वेद-शास्‍त्रों का आश्रय ले बढने के नहीं , अपनी आध्‍यात्मिक साधना से परमावस्‍था प्राप्‍त करने के प्रतीक हैं। वे सगुण , साकार का आराधन कर योगावस्‍था में पहुंचे और फिर निराकार की साधना- यात्रा कर के भी वही दर्शन - अनुभव किया । वे स्‍त्रैण थे, स्‍त्री भाव के आधिक्‍य वाले , विवेकानंद में पुरुष भाव की प्रधानता थी, उन्‍होंने निराकार से साकार की यात्रा की । रामकृष्‍ण परमहंस कहते थे - दोनों मार्गों का फलित एक ही है। इस्‍लामी और ईसाई साधना पद्धति‍यों के प्रयोग से भी उन्‍होंने यही अनुभव किया। उन्‍होंने अपनी योग-ऊर्जा से अपने सर्व प्रिय शिष्‍य को लोक सेवा के उस चुनौती पूर्ण मार्ग का पथिक होने को प्रेरित किया जिस पर वह स्‍वयं नहीं चल पाये थे। इसी में गुरू- शिष्‍य दोनों की पूर्णता है। यह मार्ग था और है , सेवा का , मानव मात्र से प्रेम का , करुणा का , सहयोग का , मानवीय गरिमा के उत्‍थान का , समता का और आध्‍यात्मिक विकास का । यह कैसा 'युवा संवाद' है जिसमें केवल वक्‍ता और मुख्‍य वक्‍‍‍‍ता को बोलना है , संवाद तो उभयपक्षी होता है। अच्‍छा वक्‍ता कुशलता से विवेकानंद का नाम और उनके नाम पर हुए आयोजन को किसी दल विशेष और नेता विशेष से राजनीतिक उद्देश्‍यों के लिए जोडता है तो वह न्‍याय संगत नहीं कहा जा सकता । राजनीतिक अभीष्‍ट सिद्धि के लिए तो राजनीतिक मुद्दे ही काफी हैं ।...


नई दिल्ली/उत्तरप्रदेश ।
#शायराबानो को भी जाने... इनका #बिबाह_इलाहाबाद में हुआ था और ये अक्टूबर 2015 में अपने मायके उत्तराखंड गयी हुई थी और इनके पति ने #पत्र से #तलाक दे दिया,इनके दो बच्चे थे एक बारह साल का और एक चौदह साल का....इनके पति ने इनको अपने बच्चों से भी मिलने से वंचित कर दिया।शायराबनो इन परिस्थितियों से हार नही मानी और इस लड़ाई को शुरू की,इनकी इस लड़ाई में कई मुस्लिम महिला संगठनों ने इनका सहयोग किया।यद्यपि कि इसके पहले #शमीमआरा का मामला भी 2002 में आया था जिसमे ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित किया जा चुका था,किन्तु ये जजमेंट सर्कुलेट नही हो पाया था...फिलहाल शायराबानो के मामले में वकील श्रीनिवासन ने #पहली_बार ट्रिपल तलाक को #मूल_अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर #चैलेंज किया था,इसके अतिरिक्त #हलाला_बहुबिबाह को भी इस केस में #चैलेंज किया गया था....#मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस याचिका का विरोध कर रहा था.... #शायराबानो हिम्मत से लड़ी और एक जबरजस्त जीत हासिल करके अपने साथ साथ सभी महिलाओं को भी न्याय दिलाया....इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने #हलाला और #बहुबिबाह पर तो कुछ नही बोला लेकिन #ट्रिपल_तलाक को #असंवैधानिक_घोषित कर दिया और सरकार को छह माह में कानून बनाने का निर्देश दिया लेकिन अफसोस सियासी नफा-नुकसान की राजनीति के वजह से कानून बनने में अड़चनें आती रही लेकिन अंततः कल ट्रिपल तलाक पर बना कानून अपना सफलता से मात्र एक कदम दूर रह गया है,उम्मीद है कि वह भी चरण पार कर जाएगा और शायराबानो की लड़ाई का बेहतरीन प्रतिफल मिलेगा...…।। ट्रिपल तलाक पर माननीय उच्चतम न्यायालय,सरकार और #शायराबानो_को_बधाई ।...


भारत/नई दिल्ली।
नरेंद्र मोदी देश में उतने कमजोर नहीं हुए हैं जितने भाजपा में होते जा रहे हैं...और... यह अप्रत्याशित भी नहीं है। अमित शाह को आगे बढ़ा कर उन्होंने जिस तरह सत्ता के साथ ही संगठन पर अपना एकछत्र नियंत्रण स्थापित कर लिया था यह भाजपा के लिये नया अनुभव था। जाहिर है, शक्ति और लोकप्रियता के शिखर पर आरूढ़ शीर्ष नेता के समक्ष जन्म लेती कुंठाओं और बढ़ते असंतोष को मुखर होने का कोई अवसर नहीं मिल पा रहा था। अब...जब दुर्ग की दीवारों में छिद्र नजर आने लगे हैं तो अप्रत्यक्ष ही सही, असंतोष के स्वर भी उठने लगे हैं। यह 'ब्रांड मोदी' का करिश्मा था कि भाजपा शानदार जीत हासिल कर पहली बार अपने दम पर बहुमत में आई थी। संगठन आभारी था और दोयम दर्जे के तमाम नेता नतमस्तक। एक आडवाणी को छोड़ भाजपा में कोई पहले दर्जे का नेता था भी नहीं। लोकतंत्र में दर्जा जनता देती है और भाजपा में अटल-आडवाणी के बाद कोई नेता ऐसा नहीं रह गया था जो जनप्रियता के मामले में 'ए लिस्टर' नेता ठहराया जा सके। एक प्रमोद महाजन थे लेकिन...अब उनकी बात क्या करनी। तो...वयोवृद्ध आडवाणी को साइड करने के बाद मोदी की एकछत्रता निष्कंटक थी। बड़ी आसानी से अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवा कर उन्होंने संगठन को अपने पीछे कर लिया और इंदिरा गांधी के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री का रुतबा हासिल कर लिया। फिर...ऐसा क्या हुआ कि जिस मोदी के बारे में महज साल-डेढ़ साल पहले तक अजेयता का मिथक गढ़ा जा रहा था वे सवालों के घेरे में आते जा रहे हैं। असंतुष्ट सहयोगियों की कुंठाएं अप्रत्यक्ष प्रहार का रूप लेने लगी हैं और विरोधी उत्साहित हो उठे हैं। दरअसल, नरेंद्र मोदी को जिस स्तर का 'विजनरी' राजनेता माना गया था, अपने परिणामों में यह कहीं से नजर नहीं आया। उनके द्वारा लगाए गए प्रायः सभी दांव विपरीत असर डालने वाले ही साबित हुए। कोई कह सकता है कि उनकी नीयत सही थी। लेकिन, समस्याओं से घिरे इस देश को नीयत से बढ़ कर परिणामों की अपेक्षा थी। नोटबन्दी, जिसके परिणाम पहले दिन से ही संदिग्ध थे, के मामले में आम लोगों ने उनकी नीयत को ही प्रमुखता दी और हजार फ़ज़ीहतें झेलने के बावजूद वेनेजुएला की तरह लोग सड़कों पर नहीं उतरे। लेकिन, नोटबन्दी झंझावाती परिणाम लेकर सामने आया और साथ ही, इसने बैंकिंग सिस्टम की कलई भी उतार दी जब भ्रष्ट बैंकरों ने रातोंरात काले धन रूपी नकदी को जमा कर मुख्य धारा में ला दिया। नवउदारवादी आर्थिकी एकल बाजार की मांग करती है और भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश के संदर्भ में भी यह सत्य बदल नहीं सकता था, इस लिहाज से जीएसटी आज नहीं तो कल सामने आना ही था। मनमोहन सरकार ने भी इसके लिये प्रयास किया था लेकिन अंजाम तक इसे मोदी ने पहुंचाया। परंतु, इसके क्रियान्वयन की जटिलताओं ने मोदी सरकार के आर्थिक मामलों के कर्त्ता-धर्त्ताओं की 'मीडियाकरी' को एक्सपोज कर दिया। एक विजनरी राजनेता को प्रतिभासम्पन्न सलाहकारों और सहयोगियों की दरकार होती है लेकिन देश के साथ ही यह मोदी का भी दुर्भाग्य रहा कि जिन पर उन्होंने भरोसा किया वे पूरे के पूरे 'मीडियाकर' निकले। अंततः जीएसटी, जिसके बारे में उम्मीदें की जा रही हैं कि यह एक दिन बेहतर परिणाम सामने लाएगा, अपने वर्त्तमान दौर में हाहाकारी प्रभावों के साथ लोगों, खास कर छोटे और मंझोले व्यापारियों की अंतहीन परेशानियों का सबब बन गया। दरअसल, नरेंद्र मोदी की एक दिक्कत यह भी रही कि उनके नेतृत्व में सत्ता प्रतिष्ठान को प्रतिभाशाली और स्वतंत्र चेता 'प्रोफेशनल्स' बर्दाश्त ही नहीं हुए। रघुराम राजन इसके एक उदाहरण हैं। इस मामले में मोदी जी इंदिरा गांधी से सीख ले सकते थे जो प्रतिभाओं का सम्मान करती थीं और उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रता भी देती थीं। आज के दौर में कोई भी सरकार अपनी आर्थिक उपलब्धियों को लेकर ही आंकी जाती है, लेकिन नरेंद्र मोदी जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं वह अपने जनसापेक्ष आर्थिक चिंतन के लिये नहीं, विशिष्ट सांस्कृतिक चिंतन के लिये जानी जाती है। ऐसा एकायामी चिंतन, जो अपने मौलिक संदर्भों में आज के भारत के लिये अनेक सांस्कृतिक संकटों का जनक बन गया है। तो...सांस्कृतिक स्तरों पर बढ़ते कोलाहल के बीच आर्थिक उपलब्धियों के मामले में दरिद्रता ने मोदी सरकार को आमलोगों की नजरों में एक्सपोज करना शुरू कर दिया। कहाँ तो दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष सृजित करने का वादा था...कहाँ बेरोजगारी की दर उच्चतम स्तरों को छूने लगी। कौशल विकास योजना का भ्रामक नारा दलित, पिछड़ों और ग्रामीण युवाओं के प्राइवेट नौकरियों में प्रवेश में सहायक नहीं बन सका। इधर, सरकारी नियुक्तियों में घोषित-अघोषित रोक ने हालातों को बद से बदतर बना दिया। बढ़ती हुई बेरोजगारी और इस फ्रंट पर मोदी सरकार की नाकामियों ने 'ब्रांड मोदी' की चमक पर सबसे गहरा धब्बा लगाया। उम्मीदों से भरे युवाओं के लिये यह ऐसी नाकामियां आपराधिक थीं। बदतर यह...कि बेरोजगारों के हाथों में ज्ञात-अज्ञात संगठनों ने लट्ठ, तलवारें और किसिम-किसिम के झंडे थमाने शुरू किए। युवाओं को कभी "मां भारती" पुकारने लगी तो कभी 'धर्म' अपने रक्षार्थ उनका आवाहन करने लगा, कभी "गोमाता की चीत्कार" पर लोगों को गोरक्षक बना कर हत्यारा बनाया जाने लगा तो कभी "राम लला हम आएंगे" जैसे निरर्थक और विभाजक नारे लगाते युवा शान्तिकामी समाज के सामने सवाल बन कर खड़े होने लगे। देश के स्तर पर ऐसी अशांतियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति हास्यास्पद बनाई और युवाओं को भटकाव के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसी मान्यताओं के आधार हो सकते हैं कि व्यक्तिगत स्तरों पर नरेंद्र मोदी ने हत्यारे गोरक्षकों और लंपट रामभक्तों को बढ़ावा नहीं दिया, लेकिन यह तथ्य तो सामने है कि उनके राज में इन नकारात्मक शक्तियों ने जम कर उत्पात मचाया और देश को सांस्कृतिक विभाजन के रास्ते पर धकेला। मामला फिर 'नीयत' और 'परिणाम' का ही सामने आता है। मोदी सरकार ऐसे उपद्रवकारी तत्वों पर लगाम कसने में विफल साबित हुई और विरोधियों को यह कहने का मौका मिला कि ऐसी अशांतियाँ स्वयं 'सरकार प्रायोजित' ही हैं। शक्तिशाली प्रधानमंत्री का मिथक तब टूटने लगा जब नरेंद्र मोदी अपने नीतिगत निर्णयों और कार्यकलापों में कारपोरेट शक्तियों द्वारा संचालित होने का आरोप झेलने लगे। ऐसे एक से एक उदाहरण सामने आने लगे जो मोदी को जनता का नेता नहीं, सत्ता में कारपोरेट का प्रतिनिधि साबित करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने लगे। आयुष्मान भारत योजना, उच्च शिक्षा संरचना में नीतिगत बदलावों का खाका, गैस नीति, राफेल प्रकरण आदि ने उनकी शक्तिशाली राजनेता की छवि पर कारपोरेट परस्ती की गहरी छाप लगाई। संस्थाओं का निर्माण और विघटन गतिशील लोकतंत्र के लिये एक सामान्य प्रक्रिया है। इसलिये, नरेंद्र मोदी ने नेहरू युगीन संस्थाओं को वैकल्पिक रूप देना शुरू किया तो यह कतई अस्वाभाविक नहीं था। लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में स्वप्नद्रष्टा राजनेता की वह छाप नहीं पड़ सकी जो लोगों को आश्वस्त कर सकता। नीति आयोग योजना आयोग का प्रहसन नुमा विकल्प बन कर सामने आया जिसके कर्णधार प्रोफेशनल्स सरकार की निजीकरण की नीतियों का खाका खींचने वाले कारपोरेट एजेंट के अलावा कुछ और नहीं लगते हैं। साहित्य अकादमी से लेकर आईआईटीज तक को बाजार में धकेलने की नीतियां कई सारे सवालों को जन्म देती है जिसका जवाब देने के लिये अहंकारी सत्ता प्रतिष्ठान कतई उत्सुक नहीं लगता। संस्थाओं के साथ नाकाम प्रयोग, उनकी गरिमा पर प्रहार, उनकी स्वायत्तता में हस्तक्षेप आदि ऐसे अध्याय हैं जो अंतहीन सवालों को जन्म देते हैं। नतीजा...जिन-जिन को लगा कि मोदी सरकार की मनमानियों पर चुप्पी के लिये इतिहास भविष्य में उन्हें कठघरे में खड़ा कर सकता है, उन्होंने पलायन को ही उपयुक्त रास्ता समझा। रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल हों या प्रधानमंत्री के विभिन्न सलाहकारों का इस्तीफा...यह इतिहास के सवालों से बचने का उपक्रम ही तो है। लेकिन...नरेंद्र मोदी कैसे बचेंगे? उन्हें तो जवाब देने ही होंगे। इतिहास अपनी कसौटियों को लेकर अत्यंत निर्मम होता है। बढ़ती बेरोजगारी, महंगी होती शिक्षा और चिकित्सा, युवाओं का आक्रोश, किसानों की बेचारगी आदि-आदि, आमलोगों का संशय, पार्टी के साथियों की कुंठाओं और उनके असंतोष की अभिव्यक्तियों की शुरुआत, जमीन सूंघते राजनीतिक विरोधियों का बढ़ता उत्साह...नरेंद्र मोदी के साढ़े चार साल की सत्ता का हासिल यही है। उनकी उपलब्धियों से बड़ा ग्राफ उनकी असफलताओं का है। आशाओं और आश्वस्तियों का स्थान निराशाओं ने लेना शुरू कर दिया है। राजनीतिक अजेयता का मिथक अब पुनर्वापसी के संशय में बदल रहा है। सपनों का सौदागर कहीं धुंध में गुम होता जा रहा है।...


मध्यप्रदेश/भोपाल ।
शिवराज सिंह चौहान की हार से इसलिए मन खिन्न है और बुरी तरह क्षुब्ध है क्योंकि मप्र की जनता उसी तरह हारी है जिस तरह 1927 और 1931 में पूरे हिन्दूस्तान की जनता 4 गद्दारों से हार गयी थी। पूरी पोस्ट बहुत ध्यान से पढ़िए। यह पूरी पोस्ट पढ़ने से पहले यह समझ लीजिए कि अगस्त 1947 से दिसम्बर 2003 तक की 56 वर्ष की समयावधि में 51 साल तक मप्र में कांग्रेस का एकछत्र राज्य था। शेष 5 वर्षों में ढाई-ढाई वर्षों की अल्पावधि की गैर कांग्रेसी सरकारें रहीं। अतः यह पोस्ट शिवराज/भाजपा के 15 वर्ष बनाम कांग्रेस के 51 वर्ष की कहानी भी है। दिसम्बर 2003 में मध्यप्रदेश की जनसंख्या लगभग 6.25 करोड़ थी। पिछले 15 वर्षों के दौरान इसमें लगभग 30% की वृद्धि हुई और वो आज बढ़कर लगभग 8.10 करोड़ हो चुकी है। 2003 तक मप्र में 7.5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती थी। नहरों के माध्यम से कृषि भूमि की सिंचाई की इस सुविधा में पिछले 15 वर्षों में लगभग 433% की वृद्धि हुई और आज यह सुविधा लगभग 40 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को उपलब्ध हो चुकी है। 2003 तक मध्यप्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र 1.99 करोड़ हेक्टेयर था जिसमें पिछले 15 वर्षों में 44 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई और आज यह बढ़कर 2.43 करोड़ हेक्टेयर हो चुका है। 2003 तक के 56 वर्षों में मध्यप्रदेश में जो खाद्यान्न उत्पादन 1.59 करोड़ मीट्रिक टन के आंकड़ें तक पहुंच पाया था उसमें पिछले 15 वर्षों में लगभग 2.62 करोड़ मीट्रिक टन की वृद्धि हुई। आज मध्यप्रदेश 4.21 करोड़ मीट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन करता है। 2003 तक 18.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में मध्यप्रदेश में गेंहू की उत्पादकता 36.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो चुकी है। इसी प्रकार धान की उत्पादकता में लगभग साढ़े तीन गुना की वृद्धि हुई है। 2003 तक मात्र 10.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में मध्यप्रदेश में धान की उत्पादकता 36.11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो चुकी है। मध्यप्रदेश में कुल कृषि उत्पादन जो 2003 तक 2.14 करोड़ मीट्रिक टन था वह आज बढ़कर 5.44 करोड़ मीट्रिक टन हो चुका है। 50 वर्षीय कांग्रेसी शासनकाल के दौरान मध्यप्रदेश की जो कृषि विकास दर मात्र 3% के इर्दगिर्द रहा करती थी उस कृषि विकास दर में अब 500% से की वृद्धि हो चुकी है और आज वह बढ़कर 18.89% हो चुकी है। 50 वर्षों के कांग्रेसी शासनकाल के पश्चात दिसम्बर 2003 तक मध्यप्रदेश की सत्ता से कांग्रेस की विदाई के समय राज्य में 2900 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा था। लेकिन 2003 के पश्चात 15 वर्ष के भाजपा शासनकाल के दौरान राज्य में बिजली उत्पादन में लगभग 533% वृद्धि हुई और मध्यप्रदेश में आज लगभग 18,364 मेगावॉट बिजली उत्पादन हो रहा है। 51 वर्षों के कांग्रेसी शासनकाल के पश्चात दिसम्बर 2003 तक मध्यप्रदेश की सत्ता से कांग्रेस की विदाई के समय तक राज्य में कुल 44,787 किमी लम्बी सड़कों का निर्माण हुआ था। लेकिन 2003 के पश्चात 15 वर्ष के भाजपा शासनकाल के दौरान राज्य में सड़कों की लम्बाई में लगभग 235% की वृद्धि हुई। इन 15 वर्षों के दौरान लगभग 1,05,213 किमी सड़क का निर्माण हुआ और राज्य में आज सड़कों की लम्बाई लगभग 150,000 किमी हो चुकी है। 2003 तक मध्यप्रदेश में केवल 32 किमी लम्बाई का फोर लेन हाइवे बना था। जबकि पिछले 15 वर्षों के दौरान इसमें लगभग 63 गुना वृद्धि हुई और मध्यप्रदेश में 2008 किमी लम्बाई के फोर लेन हाईवे बन चुके हैं तथा 1200 किमी लम्बाई के फोर लेन हाइवे निर्माणाधीन हैं जो अगले 2 वर्षों में बनकर तैयार हो जाएंगे। यानि 2020 तक मध्यप्रदेश में फोर लेन हाइवे की लम्बाई 3200 किमी हो जाएगी। यह उपलब्धि 50 वर्ष के कांग्रेसी शासनकाल में बने फोर लेन हाईवे से सौ गुना अधिक है। 2003 तक राज्य में प्राथमिक पाठशालाओं की संख्या 55980 थी जिनकी संख्या में पिछले 15 वर्षों में लगभग 50% की वृद्धि हुई और राज्य में आज 83890 प्राथमिक पाठशालाएं कार्यरत हैं। 2003 तक राज्य में माध्यमिक स्कूलों की संख्या 12490 थी जिनकी संख्या में पिछले 15 वर्षों में लगभग 143% की वृद्धि हुई और राज्य में आज 30341 माध्यमिक स्कूल कार्यरत हैं। इसी प्रकार पिछले 15 वर्षों के दौरान राज्य में हाई स्कूलों की संख्या में लगभग 178% तथा हायर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या में लगभग 135% की वृद्धि हुई है। यह मप्र में हुई विकास यात्रा के कुछ वो उदाहरण हैं जिनकी दस्तावेज़ी पुष्टि लगातार 9 वर्षों तक कांग्रेसी यूपीए की सरकार भी करती रही। ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धियों की सूची बहुत लम्बी है। इसलिए शिवराज सिंह चौहान की हार से मेरा मन खिन्न है और बुरी तरह क्षुब्ध है। लेकिन अब जरा याद करिये सोशलमीडिया में हिन्दूवादी भेड़ की खाल में छुपे उन चंदाखोर भेड़ियों को जो पिछले काफी लम्बे समय से शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ अपने नीच गलीज़ क्षुद्र तुच्छ धनलोलुप स्वार्थों का ज़हर हिन्दूवाद का ठेकेदार बनकर उगल रहे थे। आज ये चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़िये जब जमकर कोसे गरियाये जा रहे हैं तो दुहाई दे रहे हैं कि मप्र की जनता को मत कोसो। अतः इन चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़ियों को बताना चाहता हूं कि मप्र की उस जनता का कोटि कोटि अभिनंदन जिसने कांग्रेस से ज्यादा वोट भाजपा को दिए हैं। लेकिन वो जनता उसी तरह हारी है जिस तरह 1927 और 1931 में पूरे हिन्दूस्तान की जनता 4 गद्दारों से हार गयी थी। 1927 में बिस्मिल अशफ़ाक़ रोशन सिंह और लाहिड़ी के साथ पूरा देश खड़ा था लेकिन बनारसी और बनवारी नाम के उन 2 गद्दारों की गवाही की वजह से वो मौत के घाट उतर गए थे जिन दोनों गद्दारों का दावा था कि वो भी देशभक्त और क्रांतिकारी हैं। जबकि सच यह है कि गवाही के लिए दोनों को सज़ा माफ़ी के साथ अंग्रेजों ने 5-5 हज़ार रुपये दिए थे। वह रकम आज के 5 करोड़ से ज्यादा थी। इसीतरह 1931 में जब पूरे देश की भावनाएं चंद्रशेखर आज़ाद के लिए उमड़ रहीं थीं तब वीरभद्र और यशपाल नाम के 2 गद्दारों की मुखबिरी पूरे देश पर भारी पड़ी थी। उनकी मुखबिरी की सहायता से अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आज़ाद को मौत घाट उतार दिया। इन दोनों गद्दारों का भी दावा था कि वो भी देशभक्त और क्रांतिकारी हैं। अतः बनारसी/बनवारी/वीरभद्र/यशपाल की परम्परा के चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़िये अब मप्र की जनता की ओट में छुपने की कोशिश ना करें।...


पटना /दिल्ली ।
5 अक्तूबर/जन्म-दिवस तपस्वी राजनीतिज्ञ कैलाशपति मिश्र राजनीति को प्रायः उठापटक और जिन्दाबाद-मुर्दाबाद वाला क्षेत्र माना जाता है; पर संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री कैलाशपति मिश्र ने यहां रहकर अपने आदर्श आचरण से समर्थक ही नहीं, तो घोर विरोधियों तक को प्रभावित किया। बिहार और झारखंड में उन्होंने जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। सबसे वरिष्ठ होने के कारण वे ‘भीष्म पितामह’ माने जाते थे। श्री कैलाशपति मिश्र का जन्म पांच अक्तूबर, 1923 को बिहार के बक्सर जिले में स्थित ग्राम दुधारचक में श्री हजारीप्रसाद मिश्र के घर में हुआ था। इस परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी; लेकिन कैलाशपति जी की रुचि पढ़ने में बहुत थी। 1942 में वे कक्षा दस के छात्र थे। उन दिनों देश भर में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन का जोर था। श्री कैलाशपति मिश्र ने भी उस आंदोलन में सहभाग करते हुए जेल की यात्रा की। जेल से आकर वे फिर पढ़ाई में लग गये। 1945 में उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ और फिर वही उनके जीवन का ध्येय बन गया। उन्होंने अविवाहित रहकर संघ के माध्यम से देशसेवा का व्रत ले लिया। शिक्षा पूर्ण कर उनके प्रचारक जीवन की यात्रा 1947 में प्रारम्भ हुई। क्रमशः आरा, पटना और पूर्णिया में संघ का काम करने के बाद 1959 में उन्हें जनसंघ के बिहार प्रदेश संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। इससे पूर्व संघ पर 1948 में लगे प्रतिबंध के विरोध में वे जेल भी गये थे। उन दिनों सब ओर कांग्रेस और नेहरू जी का डंका बज रहा था। ऐसे विपरीत माहौल में श्री कैलाशपति मिश्र के परिश्रम से बिहार के हर जिले और तहसील तक जनसंघ का नाम और काम पहुंचा गया। आपातकाल की समाप्ति के बाद उन्होंने संगठन के निर्देश पर प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और पटना की विक्रम विधानसभा से विजयी होकर विधायक बने। मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने उनकी योग्यता देखकर उन्हें वित्तमंत्री की जिम्मेदारी दी। 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन होने पर उन्हें उसकी बिहार इकाई का पहला अध्यक्ष बनाया गया। 1987 तक वे इस पद पर रहे। 1984 में उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री और उपाध्यक्ष के नाते उन्हें समय-समय पर अनेक राज्यों में चुनाव तथा संगठन सम्बन्धी कार्यों की जिम्मेदारी दी गयी, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया। जीवन के संध्याकाल में उन्होंने सक्रिय राजनीति से अवकाश ले लिया; पर जिन दिनों केन्द्र में भाजपा एवं सहयोगियों का शासन था, तब उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाया गया। कुछ समय उन पर राजस्थान के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी रहा। 2004 में केन्द्र में शासन बदलने पर वे इस जिम्मेदारी से मुक्त होकर पटना में ही रहने लगे। श्री कैलाशपति मिश्र राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत एक निष्कंलक व्यक्तित्व वाले तपस्वी राजनीतिज्ञ थे। लगभग 50 वर्षीय राजनीतिक यात्रा में उन पर न कभी कोई आरोप लगा और न ही वे कभी किसी विवाद में फंसे। राजनीति के दलदल में कमल के समान अहंकार, बुराई, द्वेष, लोभ-लालच आदि से वे मीलों दूर रहे। वे सत्ता में भी रहे और विरोध पक्ष में भी; पर अपने विचारों से कभी विचलित नहीं हुए। इस कारण विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। आगे चलकर बिहार और झारखंड में भाजपा ने कई बार सत्ता का सुख भोगा। यह श्री कैलाशपति मिश्र की तपस्या का ही सुपरिणाम था। तीन नवम्बर, 2012 को पटना में लम्बी बीमारी के बाद उनका देहांत हुआ। प्रखर विचारों और विशुद्ध आचरण वाले ऐसे मनीषी राजनेता को बिहार में भाजपा के कार्यकर्ता आज भी अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। (संदर्भ : पांचजन्य 18.11.2012) -----------------------------...