नई दिल्ली / बिहार।
चीन के पैसों से आपातकाल में हिंसक आंदोलन चलाने का जार्ज फर्नांडिस पर आरोप मढ़ना चाहती थी सी.बी.आई. ............................................ --सुरेंद्र किशोर-- .................................................. ‘‘यदि सुरेंद्र अकेला पकड़ा जाता तो उससे हमें जार्ज का चीन से संबंधों का पता चल सकता था।’’ बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र मुकदमे की जांच में लगे एक अफसर ने मेरे एक मित्र को यह बात बताई थी। उस अफसर की ‘जानकारी’ के अनुसार अकेला यानी मैं हर महीने नेपाल स्थित चीनी दूतावास से पैसे लाता था। उसकी तथाकथित ‘जानकारी’ दरअसल उच्चत्तम स्तर पर की गई साजिश की उपज मात्र थी। उसमें कोई सच्चाई नहीं थी। हां,मैं जार्ज से बिहार में जुड़े भूमिगत कार्यकत्र्ताओं के खर्चे के लिए हर महीने कानपुर से जरूर थोड़े पैसे लाया करता था। जहां तक नेपाल का सवाल है, न तो कभी सुरेंद्र सिंह नेपाल गया, न ही सरेंद्र अकेला और न ही सरेंद्र किशोर। याद रहे कि तीनों एक ही व्यक्ति का नाम रहा है। फिर भी यदि मैं पकड़ा जाता तो मेरे नाम पर आपातकाल में अखबारों के जरिए देश को यह बताया जाता था कि किस तरह जार्ज चीन का एजेंट है। जहां तक मेरी जानकारी है,बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे में सी.बी.आई.द्वारा तैयार केस में झूठ और सच का मिश्रण ही था। एक झूठ की चर्चा यहां कर दूं। वह यह कि ‘‘जुलाई, 1975 में पटना मेें चार लोगों ने मिलकर यह षड्यंत्र किया कि इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकना है। वे चार लोग थे-जार्ज फर्नांडिस,रेवतीकांत सिन्हा,महेंद्र नारायण वाजपेयी और सुरेंद्र अकेला।’’ सच यह है कि इस तरह के किसी षड्यंत्र की खबर मुझे नहीं थी। हालांकि आपातकाल में जितने समय तक जार्ज पटना में रहे ,मैं उनसे लगातार मिलता रहा। याद रहे कि डरा-धमका कर सी.बी.आई.ने रेवती बाबू जैसे ईमानदार व समर्पित व्यक्ति को मुखबिर जरूर बना दिया था। रेवती बाबू को सी.बी.आई. ने धमकाया था कि यदि मुखबिर नहीं बनिएगा तो आपका पूरा परिवार जेल में होगा। कोई मजबूत व्यक्ति भी परिवार को बचाने के लिए कई बार टूट जाता है। मैं भी टूट सकता था यदि पकड़ा जाता।मैं तो रेवती बाबू जितना मजबूत भी नहीं था। 1966-67 में के.बी.सहाय की सरकार के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों का जो ऐतिहासिक आंदोलन हुआ,उसके सबसे बड़े अराजपत्रित कर्मचारी नेता रेवती बाबू ही थे। वे जिस साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक थे,मैं उसका सहायक संपादक था। इसलिए उन्हें करीब से जानने का मौका मिला था। रेवती बाबू जैसा ईमानदार,जानकार,बहादुर और समर्पित नेता मैंने समाजवादी आंदोलन में भी कम ही देखा था। पर,आपातकाल में आतंक इतना था कि मत पूछिए। आपातकाल में शासकों से जुड़े खास लोगों व समर्थकों को छोड़ दें तो बाकी लोगों में सरकार का इतना आतंक था जितना आज कोरोना से भी नहीं है। कोई खुलकर बात नहीं करता था। प्रतिपक्षी नेताओं -कार्यकत्र्ताओं से, जो गिरफ्तारी से बचे थे, भूमिगत थे, बात करने से पहले कोई भी आगे-पीछे देख लेता था कि कोई तीसरा देख तो नहीं रहा है। ................................... ‘न्यूजवीक’ पत्रिका की काॅपी मैंने एक समाजवादी नेता को उनके आवास पर जाकर पढ़ने के लिए दिया। उसमें जेपी व जार्ज की तस्वीरों के साथ आपातकाल विरोधी भूमिगत आंदोलन पर रपट छपी थी। खुद मैंने उसे पढ़़ने के बाद यह पाया था कि ऐसी रपट शायद उन्हें पढ़ने को नहीं मिली होगी। पर वे तो इतना डरे हुए थे कि पढ़े बिना ही उसे लाइटर से तुरंत जला दिया। मैं रोकता रह गया। जिस तरह आज बिना मास्क के बाहर निकलना मना है,उसी तरह तब सरकार विरोधी ‘लिटरेचर’ अपने पास रखना मना था। ..................................... मुझे इसलिए भी मेघालय भागना पड़ा क्योंकि सी.बी.आई.मुझे खोज रही थी। मैं भागा-फिर रहा था। न कोई पैसे देने का तैयार और न शरण। इक्के -दुक्के लोग ही छिपकर आंदोलनकारियों की थोड़ी मदद कर देते थे।थोड़ी मदद से जीवन कैसे चलता ? जो जेलों में थे,उनकी अपेक्षा भूमिगत लोग काफी अधिक कष्ट में थे। मेघालय में कांग्रेस की सरकार नहीं थी।मेरे बहनोई वहां कपड़े का व्यापार करते थे। ...................................... नोट-जार्ज फर्नांडिस, ‘बाबा’ या ‘सुदर्शन’ या किसी अन्य नाम से भूमिगत जीवन के अपने साथियों को पत्र लिखा करते थे। वैसे ही एक पत्र की काॅपी यहां पेश है।...


नई दिल्ली / महाराष्ट्र।
हम उस "कथित माफीनामे" को सोने के फ्रेम में मढ़वायेंगे.... ------------------------------------------------ स्वातंत्र्यवीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। 'नाम में क्या रखा है' वाली वाहियात फिलॉसपी और किसी के साथ भले चस्पां हो जाती हो पर ऐसा सावरकर के नाम के साथ कतई नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि वो सचमुच "विनायक" थे। हिन्दू ग्रंथों ने कहा है कि हर शुभ काम विनायक गणेश के नाम के साथ शुरू किया जाये; तो हिंदुत्व का वर्तमान स्वरुप, "हिंदवः सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्" का वर्तमान हिन्दू दर्शन और इस वर्तमान स्वरुप को दिशा देने वाले संगठन आरएसएस का आरंभ इस विनायक (जिसे हम स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम से जानतें हैं) के आशीष से हुआ था। दलित उद्धार, अश्पृश्यता-निवारण, गैर-ब्राह्मणों का पुरोहित प्रशिक्षण, शुद्धि आन्दोलन, हिन्दू का सैनिककरण, 'शठे शाठ्यम समाचरेत' का सिद्धांत' अखंड भारत, इतिहास शुद्धिकरण और उसका पुनर्लेखन, कलम के माध्यम से समाज जागरण, समान विचार वाले सबको साथ जोड़ने का अभिनव मन्त्र; इन सब के प्रबोधक और मंत्रद्रष्टा स्वातंत्र्यवीर सावरकर ही थे। संघ के संगठनों के जितने विविध आयाम हैं, अश्पृश्यता विरोधी जितने अभियान हैं और बाबा रामदेव का जो स्वदेशी जागरण का आंदोलन है, इन सब कामों का आधार स्वातंत्र्यवीर सावरकर का दर्शन ही है। सावरकर वो थे जिनकी दृष्टि हिंदुत्व के विचार को लेकर कभी भ्रम में नहीं रही। जिस दौर में सावरकर हुए वो दौर आर्य समाज के व्यापक विस्तार का दौर था, ऋषि दयानंद की शिक्षा के चलते हम अपने लिए हिन्दू शब्द प्रयोग करना छोड़ने लगे थे परंतु सावरकर ने कभी हिन्दू शब्द को गाली रूप में नहीं लिया बल्कि इस शब्द को राष्ट्रीयता के पर्याय में रूपांतरित कर दिया। समाज में ये भी भ्रम था कि किसी ने गौमांस खिला दिया तो हम हिन्दू नहीं रखेंगे, ऐसे में सावरकर ने गर्वोक्त घोषणा की थी कि गोमांस तो क्या किसी अधर्मी का रक्तपान भी मेरे हिंदुत्व को कम नहीं कर सकता। इस गर्वोक्ति से उन्होंने छल से हो रहे मतान्तरण पर रोक लगाई। समाज के ऊँचे लोगों के मन में अपने हिन्दू होने को लेकर हीनता और अपराधबोध था, जो लोग हिन्दू समाज जीवन और भारत के स्वाधीनता समर में लगे हुए भी थे उनमें भी दूरदृष्टि का अभाव था ऐसे में वो सावरकर थे जिन्होंने हिन्दुत्व को भारत की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा-निर्धारक मुद्दा बनाकर केंद्र में ला दिया। सावरकर वो थे जिन्होंने सबसे पहले इस सत्य को समझ लिया था कि भारत का कल्याण, भारत भूमि का रक्षण और स्वाधीन भारत का काम केवल यहाँ का मुख्य समाज ही कर सकता है और उनको ही करना है। भारत का भविष्य गैरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए उन्होंने भारत के स्वातंत्र्य समर में गैरों को न तो शामिल नहीं किया और न ही इसके लिए उनकी खुशामदें की, इसलिए सावरकर वो थे जिन्होंने सबसे पहले ये समझा और समझाया था कि "तुष्टीकरण केवल और केवल पुष्टिकरण है।' सावरकर वो भी थे जिन्हें अस्पृश्यता का दंश नहीं झेलना पड़ा था फिर भी वो अस्पृश्यता का दर्द महसूस करते थे। आज के फर्जी अंबेडकरवादियों के तरह उन्होंने इस दर्द का प्रदर्शन कर तालियाँ नहीं बटोरी बल्कि वंचित बस्तियों में जाकर उनके दर्द को साँझा किया। सावरकर वो थे जिन्होंने हिन्दू समाज को "मोपला" और गोमांतक नाम का उपन्यास लिख कर दिया जिसमें हमारे तमाम वर्तमान दुखों का निवारण मन्त्र है। हिन्दू संगठन के बड़े नेता जहाँ आलोचनाओं से घबराकर ये कहने में लग जाते थे कि मैं बड़ा स्वाधीनता सेनानी रहा हूँ वही सावरकर भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के इतने बड़े सेनानी होने के बाबजूद हमेशा यही कहते थे कि मुझे स्वातंत्र्यवीर सावरकर की जगह "हिन्दू संगठक सावरकर" कहो। यानि सावरकर जानते थे कि स्वाधीनता हमें भले मिल जाए पर अगर हिन्दू संगठन न हुआ तो देश पुनः गुलाम हो जाएगा, इसलिए हिन्दू समाज का संगठन भारत की पहली और अंतिम अनिवार्य आवश्यकता है। न तो बाली का छिपकर वध करने वाले राम हमारे लिए कायर हैं और न ही रणभूमि से भागने वाले कृष्ण कायर हैं। देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप धर्मरक्षण के लिए उठाये गये क़दमों को हमारे ग्रंथों ने मान्यता दी है और उन्हें भी धर्म की श्रेणी में रखते हुए "आपद धर्म" कहा है और हमारे पूर्वजों और श्रेष्ठ पुरुषों ने इस आपदधर्म का अनुपालन भी किया है। भले ही सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी होगी या या भरा होगा कोई माफीनामा, हमें उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता,अगर वैसा कोई कथित माफीनामा है भी तो "विनायक" का वो माफीनामा संपूर्ण हिन्दू समाज के दीर्घ जीवन के लिए आज संजीवनी बन गया है। विनायक कारागृह से बाहर नहीं आते तो हम आज उस स्वाभिमान के साथ खड़े नहीं होते जिसके साथ आज खड़े हैं। विनायक अगर बाहर नहीं आते तो एक "हिन्दू-राष्ट्रवादी" आज भारत के भाग्य रथ का सारथी नहीं बना होता। आज अगर करोड़ों सीने में भारत माँ के मान और हिंदुत्व के अभिमान का दीपक प्रज्जवलित है तो ये इसलिए है क्योंकि इसकी लौ उस महान आत्मा के ज्योतिर्पुंज से ही प्रदीप्त है। इसे एक बार महसूस करके देखिये फिर भारत भूमि पर अवतरित हिंदुत्व के इस विनायक भगवान का मोल समझ में आ जायेगा। सावरकर इसलिये पूज्य नहीं हैं कि उनका नाम किसी स्कूल के किताब या किसी जेल के शिलापट्ट पर लिखा है बल्कि सावरकर इसलिए पूज्य हैं क्योंकि उनका नाम हर देशभक्त के सीने में अंकित है और जहाँ तक उस कथित माफीनामे का सवाल है तो वो "कथित माफीनामा" अगर है भी तो वो सोने के फ्रेम में मढ़वाकर सहेज कर रखने लायक धरोहर है, शर्मिंदा होने का कारण नहीं।...


नई दिल्ली /तक्षशिला/नालंदा।
मैं सैनिक बच्चों के मध्यवर्गीय संस्कारों के स्कूल केन्द्रीय विद्यालय का पढ़ा हूं। इसलिए तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय का नाम बचपन से सुनता आया हूं। स्कूल के दिनों से हम हर रोज सुबह स्कूल की प्रार्थना सभा में विद्यालय गीत गाते थे-'भारत का स्वर्णिम गौरव केंद्रीय विद्यालय लाएगा- तक्षशिला, नालंदा का इतिहास लौट कर आएगा।' स्कूल में पहली से 12वीं तक यानी बारह साल पढ़ा। उसके बाद कई और साल बीत गए। लेकिन इस देश में तक्षशिला, नालंदा का इतिहास लौट कर नहीं आया। पर गीत तो सिर्फ गाने गुनगुनाने के लिए होते हैं। खैर काफी बाद में इन दोनों विश्वविद्यालयों के बारे में पढ़ा तो हैरत चकित रह गया। मुझे पता चला कि पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले में स्थित तक्षशिला, दुनिया का पहला विश्वविद्यालय था, जो ईसा मसीह के जन्म से कोई सात सौ साल पहले बना था। यानी महात्मा बुद्ध के जन्म से भी पहले। बाद में यह कई सदियों तक हिन्दू और बौद्ध दोनों के लिये शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। भारत में पहली बार राष्ट्रवाद का सपना देखने वाले चाणक्य यही के आचार्य थे। जबकि वह पाटलिपुत्र यानी आधुनिक पटना के निवासी थे। तब देश भर के छात्र पढ़ने के लिये तक्षशिला जाते थे। पहली बार कश्मीर से कन्याकुमारी तक के सम्पूर्ण भारत पर राज करने वाला उनका योग्य शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य भी तक्षशिला का छात्र था। आज के प्रगतिशील इसे कोरी काल्पित कथा बता कर हवा में उड़ा देते। वह तो भला हो पुराविद् सर जॉन मार्शल का जिसने 1912 से 1929 के बीच तक्षशिला की पुरातात्विक खुदाई कर विश्वविद्यालय के खोए हुए अवशेष बाहर निकाल दिए। इससे पता चला कि उस जमाने में जब पूरी दुनिया जहालत के अंधकार के डूबी थी तब तक्षशिला में कोई दस हज़ार छात्रों के रहने और पढ़ाई की सुविधाएं थीं। कोई दो हजार शिक्षक थे। विश्वविद्यालय में सैकड़ों आवास थे। पढ़ाई के लिए बड़ी कक्षाएं, सभागृह और पुस्तकालय थे। जातक कथाओं और विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां दुनिया का पहला मेडिकल कालेज था। तक्षशिला 'आयुर्वेद विज्ञान' का सबसे बड़ा केन्द्र था, जहां मेडिकल के छात्र मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों के अंदर तक का ऑपरेशन बड़ी आसानी से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के इलाज सरल और सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। उन्हें तमाम दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। इस जगह को 1980 से यूनेस्को की विश्व विरासत लिस्ट में शामिल कर लिया। इस्लाम के जाहिल आक्रान्ताओं ने छठी सदी में इस विश्वविद्यालय को नेस्तनाबूद कर दिया क्योंकि उनके हिसाब से किताब सिर्फ एक थी। इसी तरह 5वीं सदी में बिहार से 56 मील दूर दक्षिण पूर्व में नालंदा एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय था। यह विश्वविद्यालय अगले पाँच दशकों तक शैक्षिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र रहा। यहां भी करीब 12 हजार छात्र और तीन हजार शिक्षक हुआ करते थे। दसवीं सदी में एक बेवकूफ किस्म के आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे आग के हवाले कर दिया था। कहते हैं इसके पुस्तकालय में इतनी किताबें थी कि लगातार तीन महीने तक धूं-धूं करके जलती रहीं। ताम्रपत्रों पर लिखी ये किताबें और अभिलेख अगर आज होते तो भारत में शोध और अनुसंधान की कुछ और ही तस्वीर होती। जितने आविष्कार दुनिया में हुए उनमें अधिकांश के आधारभूत सूत्र इन किताबों में थे। चाहे वह विज्ञान की किताब हो, भौतिक शास्‍त्र की या फिर चिकित्सा या गणित की। खैर, भारत से तक्षशिला और नालंदा का नामोनिशान मिट गया। हमने कभी दूसरा तक्षशिला-नालंदा बनाने की कोशिश भी नहीं की। ले दे के हिन्दू और मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाए जो धार्मिक संकीर्णीता के कैदी बन कर रह गए। एक जेएनयू बनाया गया उसका हाल सबके सामने है। जहां पढ़ाई कम और मूर्खतापूण हरकतें ज्यादा होती है। जॉन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी के कैम्पस में घूमते वक्त न जाने क्यों मुझे तक्षशिला-नालंदा के ऐतिहासिक परिसर याद आ गए। मैंने तक्षशिला नालंदा के अवशेष तो नहीं देखे लेकिन जॉन्स हापकिंस कैम्पस देखकर मैं अंदाजा लगा सकता हूं कि इनके कैम्पस कैसे रहे होंगे। अमेरिका में जान्स हापकिंस जैसे लोगों ने इतिहास को पत्थरों में ढाल कर नया इतिहास रच गए। जॉन्स हापकिंस अमेरिका के बड़े उद्योगपति थे। वे निसंतान मरे और उन्होंने 1876 में अपनी सारी दौलत वह इस विश्वविद्यालय के नाम कर गए। यह अमेरिका को एक बड़ा तोहफा था। सुबह और शाम हमारी कक्षाएं लगती थीं। विश्व विख्यात प्रोफेसर बड़ी-बड़ी हॉलनुमा कक्षाओं में हमें पढ़ाते थे। कक्षा से लौटते वक्त मेरी नजर चार्ल्‍स कामन्स के सामने ही जॉन्स हापकिंस की प्रतिमा पर पड़ी। प्रतिमा के एक तरफ महिला और दूसरी तरफ एक पुरुष छात्र को बैठा दिखाया गया हैं। विश्वविद्यालय के पहले प्रेसिडेंट डेनियल कोट का मशहूर सूत्र वाक्य है-‘सत्य बोलिए क्योंकि सत्य आपको मुक्त करता है।’ खिड़की से देखता हूं नीचे सड़क पर सन्नाटा पसरा है। सूनी सड़क पर एक अंतहीन मौन। सोचता हूं यही कैम्पस में कहीं हापकिंस की कब्र भी होनी चाहिए। अगर होती तो वहां हिन्दुस्तान की तरफ से श्रद्धा के दो फूल जरूर चढ़ा देता। जारी...


उत्तर प्रदेश /लखनऊ ।
विभागीय ज्ञान..... *राजस्व विभाग में प्रचलित प्रमुख शब्द और उनके अर्थ* रकबा- क्षेत्रफल, खसरा- भूमि क्रमांक, पांचसाला- पिछले पांच' साल का खसरा चांदा- सीमा चिन्ह, मुनारा- सर्वेक्षण चिन्ह, उपकर - अबवाब (मुख्य कर का उपकर) मौसूली- वसूली प्राप्त करना, नस्ती- खात्मा, अलामत- छोटे-छोटे चिन्ह, मसाहती ग्राम- जिसकी सीमा न हो मीजान- कुल, सकूनत- निवास वाजिब-उल-अर्ज- निजी जमीन में सार्वजनिक उपयोग दर्शाने वाला रिकार्ड गिरदावरी- खेतों व फसलों का निरीक्षण कर रिकार्ड करना, तितम्मा मिलान- हल, बैल, कृषि यंत्र की गणना, गोशवारा- महायोग, रूढ़ अलामात- परंपरागत सीमा, हलफनामा- शपथ पत्र, बैनामा- विक्रय पत्र, बयशुदा- खरीदी, काबिज- कब्जा है, दीगर- अन्य, वारिसान- उत्तराधिकारी, बख्शीश- उपहार या दान, फौत - मौत, रहन- गिरवी, कैफियत- स्पष्टीकरण/विवरण साकिन- निवासी मौजा बेचिराग - बिना आबादी का गांव फकुल रहन - गिरवी रखी भूमि को छुड़ा लेना तबादला - भूमि के बदले भूमि लेना बैय - जमीन बेच देना मुसन्ना - असल रिकॉर्ड के स्थान पर बनाया जाने वाला रिकॉर्ड फर्द - नक़ल फर्द बदर - राजस्व रिकॉर्ड में होने वाली गलती को ठीक करना मिन - भाग साम्बिक - भूतपूर्व पुख्ता औसत झाड़ - पैदावार के अनुसार पक्की फसल फसल रबी - आसाढ़ की फसल फसल खरीफ - सावनी की फसल जिंसवार- फसलवार जिंस का जोड़ जलसाआम - जनसभा बशनाखत - की पहचान पर वल्दियत - पिता का नाम बतलाना हमशीरा - बहन हद - सीमा हदूद - सीमाएं सिहद्दा - तीन गांवों को एक स्थान पर मिलाने वाला सीमा पत्थर बनाम - के नाम मिन जानिब - की ओर से बिला हिस्सा - जिसमें भाग न हो नीलाम - खुली बोली द्वारा बेचना दस्तक - मांग का अधिकार तकाबी - फसल ऋण कुर्की - किसी वस्तु को सरकारी अधिकार में लेना बदस्तूर - हमेशा की तरह या पूर्ववत हाल - वर्तमान खाका - प्रारूप कारगुजारी - प्रगति रिपोर्ट झलार - नदी नाले से पानी देने का साधन जमा - भूमिकर तरमीम - बदल देना या सुधार देना मालगुजारी - भूमिकर जदीद - नया खुर्द - छोटा कलां - बड़ा खुश हैसियत - अच्छी हालत इकरारनामा - आपसी फैसला गोरा देह भूमि – गांव के साथ लगी भूमि दो फसली - वर्ष में दो फसलें उत्पन्न करने वाली भूमि सकूनत - निवास स्थान शजरा परचा - कपड़े पर बना खेतों का नक्शा शजरा किस्तवार - ट्रेसिंग पेपर पर बना हुआ खेतों का नक्शा मुसावी - मोटे कागज पर खेतों की सीमाएं दर्शाने वाला नक्शा पैमाना पीतल - मसावी बनाने के पीतल का बना हुआ इंच फरेरा - दूर झंडी देखने के लिए बांस पर बंधा तिकोना रंग-बिरंगा कपड़ा झंडी - लाइन को सीधा रखने के लिए 12 फीट का बांस क्रम - 66 इंच लम्बा जरीब का दसवां भाग गट्ठा - 57.157 इंच, जरीब का दसवां भाग अड्डा - जरीब की पड़ताल करने के लिए भूमि पर बनाया गया माप गज - भूमि नापने का पैमाना पैमाइश - भूमि का नापना शजरा नसब - भूमिदारों की वंशावली लाल किताब - गांव की भूमि से सम्बंधित पूर्ण जानकारी देने वाली पुस्तक मिसल हकूकियत - बंदोबस्त के समय विस्तार साथ तैयार की गई जमाबंदी जमाबंदी - भूमि की मिल्कियत और अधिकारों की पुस्तक खसरा गिरदावरी - हदबस्त - तहसीलवार गावों के नम्बर मिनजुमला – मिला-जुला भाग नवैयत या नौइयत- भू उपयोग पिसर मुतबन्ना - दत्तक पुत्र जोजे- पत्नी बेवा - विधवा वल्द - पिता कौमियत - जाति चाह आबनोशी- आबादी में पीने के उपयोग का कुआँ चाह आब पाशी- सिंचाई के लिए कुआँ साकिन -निवासी साकिन देह - भू अभिलेख से संबंधित उसी गांव का निवासी साकिन पाही - अन्य गांव का निवासी मुतवल्ली - मुस्लिम धार्मिक संपत्ति का कर्ता लगान - भूमिकर हदबंदी - सीमांकन बिलमुक्ता - इस खसरा नंबर के भूराजस्व मे अन्य नंबर का भूराजस्व जुड़ा हुआ है बकसरत दरखतान- अनगिनत वृक्ष मिन्हा - मिलाना इन्तकाल →मलकियत की तबदीली का आदेश । जरीब →भूमि नापने की लम्बी लोहे की जंजीर । रकबा बरारी →नम्बर की चारों भुजाओं की लम्बाई व चौडाई क्षेत्रफल निकालना रकबा→ खेत का क्षेत्रफल गोशा →खेत का हिस्सा बिसवा→ 20 बिसवांसी बिघा →20 बिसवा शर्क →पूर्व गर्व→ पश्चिम जनूब→ दक्षिण शुमाल→ उत्तर खेवट→ मलकियत का विवरण खतौनी→ कशतकार का विवरण पत्ती तरफ ठोला→ गॉंव में मालकों का समूह गिरदावर→ पटवारी के कार्य का निरीक्षण करने वाला RI दफ्तर कानूनगो →तहसील कार्यालय का कानूनगो नायब दफतर कानूनगो→ सहायक दफतर कानूनगो सदर कानूनगो→ जिला कार्यालय का कानूनगो । वासिल वाकी नवीस→ राजस्व विभाग की वसूली का लेखा रखने वाला कर्मचारी मालिक→ भूमि का भू-स्वामी कास्तकार→ भूमि को जोतने वाला एवं कास्त करने वाला । शामलात →सांझाी भूमि शामलात देह→ गॉंव की शामलात भूमि शामलात पाना →पाने की शामलात भूमि शामलात पत्ती →पत्ती की शामलात भूमि मुजारा→ भूमि को जोतने वाला जो मालिक को लगान देता हो । मौरूसी →बेदखल न होने वाला व लगान देने वाला मुजारा गैर मौरूसी →बेदखल होने योग्य कास्तकार नहरी →नहर के पानी से सिंचित भूमि । चाही नहरी→ नहर व कुएं द्वारा सिंचित भूमि चाही →क्एं द्वारा सिंचित भूमि चाही मुस्तार →खरीदे हुए पानी द्वारा सिंचित भूमि । बरानी→ वर्षा पर निर्भर भूमि । आबी →नहर व कुएं के अलावा अन्य साधनों से सिंचित भूमि । बंजर जदीद→ चार फसलों तक खाली भूमि । बंजर कदीम →आठ फसलों तक खाली पडी भूमि । गैर मुमकिन →कास्त के अयोग्य भूमि । नौतौड→ कास्त अयोग्य भूमि को कास्त योग्य बनाना । क्लर →शोरा या खार युक्त भूमि । चकौता →नकद लगान । सालाना →वार्षिक बटाई →पैदावार का भाग । तिहाई →पैदावार का 1/3 भाग । निसफी→ पैदावार का 1/2 भाग । पंज दुवंजी→ पैदावार का 2/5 भाग । चहाराम →पैदावार का 1/4 भाग । तीन चहाराम→ पैदावार का 3/4 भाग । मुन्द्रजा→ पूर्वलिखित (उपरोक्त) मजकूर→ चालू राहिन →गिरवी देने वाला । मुर्तहिन →गिरवी लेने वाला । बाया →भूमि बेचने वाला । मुस्तरी →भूमि खरीदने वाला । वाहिब →उपहार देने वाला । मौहबईला →उपहार लेने वाला । देहिन्दा→ देने वाला । गेरिन्दा →लेने वाला । लगान→ मुजारे से मालिक को मिलने वाली राशी या जिंस पैमाना हकीयत →शामलात भूमि में मालिक का अधिकारी । सरवर्क →आरम्भिक पृष्ठ । नक्शा कमीबेशी →पिछली जमाबन्दी के मुकाबले में क्षेत्रफल की कमी या वृद्वि हिब्बा →उपहार । बैयहकशुफा →भूमि खरीदने का न्यायालय द्वारा अधिकार । रहन बाकब्जा →कब्जे सहित गिरवी । आड रहन →बिला कब्जा गिरवी । रहन दर रहन →मुर्तहिन द्वारा कम राशि में गिरवी रखना । तबादला →भूमि के बदले भूमि लेना । पडत सरकार →राजस्व रिकार्ड रूम में रखी जाने वाली प्रति । पडत पटवार→ रिकार्ड की पटवारी के पास रखी जाने वाली प्रति फर्द बदर →राजस्व रिकार्ड में हुई गलती को ठीक करना । पुख्ता औसत झाड→ पैदावार के अनुसार पक्की फसल साबिक→ पूर्व का या पुराना या पहले का हाल →वर्तमान, मौजूदा । बिला हिस्सा →जिसमें भाग न हो । मिन जानिब →की ओर से । बशिनाखत →की पहचान पर । पिसर या वल्द →पुत्र दुखतर→ सुपुत्री वालिद→ पिता वालदा →माता महकूकी →काटकर दोबारा लिखना मसकूकी →बिना काटे पहले लेख पर दोबारा लिखना बुरजी→ सरवेरी सर्वेक्षण का पत्थर चक तशखीश →बन्दोबस्त के दौरान भूमि की पैदावार के अनुसार तहसील की भूमि का निरधारण दुफसली →वर्ष में दो फसलें उत्पन्न करने वाली भूमि मेड़ →खेत की सीमा गोरा देह भूमि →गॉंव के साथ लगती भूमि हकदार→ मालिक भूमि महाल →ग्राम जदीद →नया इन्तकाल →मलकियत की तबदीली का आदेश । जरीब →भूमि नापने की लम्बी लोहे की जंजीर । रकबा बरारी →नम्बर की चारों भुजाओं की लम्बाई व चौडाई क्षेत्रफल निकालना रकबा→ खेत का क्षेत्रफल गोशा →खेत का हिस्सा बिसवा→ 20 बिसवांसी बिघा →20 बिसवा शर्क →पूर्व गर्व→ पश्चिम जनूब→ दक्षिण शुमाल→ उत्तर खेवट→ मलकियत का विवरण खतौनी→ कशतकार का विवरण पत्ती तरफ ठोला→ गॉंव में मालकों का समूह गिरदावर→ पटवारी के कार्य का निरीक्षण करने वाला RI दफ्तर कानूनगो →तहसील कार्यालय का कानूनगो नायब दफतर कानूनगो→ सहायक दफतर कानूनगो सदर कानूनगो→ जिला कार्यालय का कानूनगो । वासिल वाकी नवीस→ राजस्व विभाग की वसूली का लेखा रखने वाला कर्मचारी मालिक→ भूमि का भू-स्वामी कास्तकार→ भूमि को जोतने वाला एवं कास्त करने वाला । शामलात →सांझाी भूमि शामलात देह→ गॉंव की शामलात भूमि शामलात पाना →पाने की शामलात भूमि शामलात पत्ती →पत्ती की शामलात भूमि मुजारा→ भूमि को जोतने वाला जो मालिक को लगान देता हो । मौरूसी →बेदखल न होने वाला व लगान देने वाला मुजारा गैर मौरूसी →बेदखल होने योग्य कास्तकार नहरी →नहर के पानी से सिंचित भूमि । चाही नहरी→ नहर व कुएं द्वारा सिंचित भूमि चाही →क्एं द्वारा सिंचित भूमि चाही मुस्तार →खरीदे हुए पानी द्वारा सिंचित भूमि । बरानी→ वर्षा पर निर्भर भूमि । आबी →नहर व कुएं के अलावा अन्य साधनों से सिंचित भूमि । बंजर जदीद→ चार फसलों तक खाली भूमि । बंजर कदीम →आठ फसलों तक खाली पडी भूमि । गैर मुमकिन →कास्त के अयोग्य भूमि । नौतौड→ कास्त अयोग्य भूमि को कास्त योग्य बनाना । क्लर →शोरा या खार युक्त भूमि । चकौता →नकद लगान । सालाना →वार्षिक बटाई →पैदावार का भाग । तिहाई →पैदावार का 1/3 भाग । निसफी→ पैदावार का 1/2 भाग । पंज दुवंजी→ पैदावार का 2/5 भाग । चहाराम →पैदावार का 1/4 भाग । तीन चहाराम→ पैदावार का 3/4 भाग । मुन्द्रजा→ पूर्वलिखित (उपरोक्त) मजकूर→ चालू राहिन →गिरवी देने वाला । मुर्तहिन →गिरवी लेने वाला । बाया →भूमि बेचने वाला । मुस्तरी →भूमि खरीदने वाला । वाहिब →उपहार देने वाला । मौहबईला →उपहार लेने वाला । देहिन्दा→ देने वाला । गेरिन्दा →लेने वाला । लगान→ मुजारे से मालिक को मिलने वाली राशी या जिंस पैमाना हकीयत →शामलात भूमि में मालिक का अधिकारी । सरवर्क →आरम्भिक पृष्ठ । नक्शा कमीबेशी →पिछली जमाबन्दी के मुकाबले में क्षेत्रफल की कमी या वृद्वि हिब्बा →उपहार । बैयहकशुफा →भूमि खरीदने का न्यायालय द्वारा अधिकार । रहन बाकब्जा →कब्जे सहित गिरवी । आड रहन →बिला कब्जा गिरवी । रहन दर रहन →मुर्तहिन द्वारा कम राशि में गिरवी रखना । तबादला →भूमि के बदले भूमि लेना । पडत सरकार →राजस्व रिकार्ड रूम में रखी जाने वाली प्रति । पडत पटवार→ रिकार्ड की पटवारी के पास रखी जाने वाली प्रति फर्द बदर →राजस्व रिकार्ड में हुई गलती को ठीक करना । पुख्ता औसत झाड→ पैदावार के अनुसार पक्की फसल साबिक→ पूर्व का या पुराना या पहले का हाल →वर्तमान, मौजूदा । बिला हिस्सा →जिसमें भाग न हो । मिन जानिब →की ओर से । बशिनाखत →की पहचान पर । पिसर या वल्द →पुत्र दुखतर→ सुपुत्री वालिद→ पिता वालदा →माता महकूकी →काटकर दोबारा लिखना मसकूकी →बिना काटे पहले लेख पर दोबारा लिखना बुरजी→ सरवेरी सर्वेक्षण का पत्थर चक तशखीश →बन्दोबस्त के दौरान भूमि की पैदावार के अनुसार तहसील की भूमि का निरधारण दुफसली →वर्ष में दो फसलें उत्पन्न करने वाली भूमि मेड़ →खेत की सीमा गोरा देह भूमि →गॉंव के साथ लगती भूमि हकदार→ मालिक भूमि महाल →ग्राम जदीद →नया साभार:- फेसबुक ...


नयी दिल्ली / महाराष्ट्र।
साभार अविनाश त्रिपाठी जी दो दिन पहले मैंने जीवन में पहली बार समुद्र देखा। किनारे से खड़े होकर देखने में समुद्र जितना खूबसूरत लगता है अंदर से उतना ही भयानक, तब आपका जहाज ही आपकी जमीन है और एक बार वो छूट गया तो पूरा समुद्र ही आपका कब्रिस्तान फिर भी एक आदमी है जिसने जानते बूझते बीच समुद्र में अपने जहाज से छलांग लगा दी, बिना किनारे तक पहुंचने की परवाह किए। ये 8 जुलाई 1910 था जब ब्रिटिश जहाज मोरिया फ्रांस के मार्सेल बंदरगाह पहुंचने वाला था। तब सख्त निगरानी में भारत ले जाए जा रहे 27 साल के सावरकर ने जहाज से छलांग लगा दी। लिखने वालों ने इसकी तुलना छत्रपति शिवाजी के औरंगजेब के कैद से निकल कर भागने से की। शौच के बहाने अंग्रेज पुलिस को चकमा देकर सावरकर बीच समुद्र में कूद गए। अंग्रेज पुलिस ने जहाज से उनपर गोलियां चलानी शुरू कर दी। बाद में नाव से उनका पीछा किया गया। कुछ घंटे तैरकर आखिरकार सावरकर को फ्रांस का किनारा मिल गया। कई असफल प्रयास करने के बाद 9 फीट ऊंची चट्टान चढ़कर सावरकर फ्रांस की जमीन पर थे। उन्होंने मौका पाते ही खुद को फ्रंच पुलिस के जवान को सौंप दिया लेकिन उनके पीछा करते हुए पहुंची ब्रिटिश पुलिस के दबाव में आकर फ्रंच सिपाही ने उन्हें वापस अंग्रेज पुलिस के हवाले कर दिया। इधर सावरकर भारत पहुंचे उधर उनकी गिरफ्तारी को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस की सरकार हेग के इंटरनेशनल कोर्ट पहुंच गई। फ्रांस को इस केस में हार का मुंह देखना पड़ा। फ्रंच प्रधानमंत्री की विपक्ष ने जमकर लानत-मलातन की लेकिन किसी गुलाम भारतीय के लिए फ्रंच सरकार ज्यादा दर्द लेती भी क्यों। जिस कोर्ट में सावरकर को 50 साल काला पानी की सजा हुई उस कोर्ट में सावरकर को अपने पक्ष में बोलने तक का अधिकार नहीं था। बिना आरोपी का पक्ष जाने ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 50 साल के लिए कालापानी भेज दिया। यूरोप के बर्फीले पानी में अपने जहाज से कूदने वाले सावरकर को वीर लिखने पर आज मजाक बनाया जाता है अंग्रेजों की गोलियां से बचते हुए सागर पार करने वाले सावरकर की दया याचिकाओं पर सवाल किया जाता है। अपनी वर्दी पर D (dangerous)का बिल्ला टांगे काला पानी के अंदर 6-6 महीनों के लिए Solitary confinement (जेल के अंदर जेल) पाने वाले सावरकर को अंग्रेजों का दलाल कहा जाता है और ये उस देश की कहानी है जिसके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को Boer War में अंग्रेज सरकार की वफादारी के लिए gold medal for loyalty और केसरी हिन्द की उपाधी दी गई और दो दिन पहले राहुल गांधी ने दिल्ली में अपना धरना इसलिए दो घंटे पहले समाप्त कर दिया क्योंकि ठंड बहुत थी या फेनमिषें हससि निर्दया कैसा का वचन भंगिसी ऐसा त्वत्स्वामित्वा सांप्रत जी मिरवीते भिनि का आंग्लभूमीते मन्मातेला अबला म्हणुनि फसवीसी मज विवासनाते देशी तरि आंग्लभूमी भयभीता रे अबला न माझि ही माता रे कथिल हे अगस्तिस आता रे जो आचमनी एक क्षणी तुज प्याला ॥ सागरा प्राण तळमळला You are laughing at me (in the form of the foam in your waves), but why did you break your promise of taking me back to my mother ? You have always claimed to be strong, but you are in fact afraid of the British rule. You try to call my mother weak and coward, but it applies to you. My mother is not weak, Agasthi, one of her sons had swallowed you in an instant (from the story of Agasthi Rishi) Take an oath that even if I get the throne of ‘Deity Indra’, I will decline the same and die as the last Hindu !’ Vinayak Damodar Savarkar...