सागर।
. इस लेख का असल उद्देश्य समाज को आइना दिखाना है क्योंकि कुछ समाज जातिगत आधार पर, संख्याबल, धनबल के आधार पर राजनीतिक दलों विशेषकर भाजपा को टिकिट के लिए विवश करने तुल जाते हैं। " सिर्फ अधिकार याद हैं कर्तव्य नहीं " साबूलाल जैन 18 साल का था। गढ़ाकोटा के बाजार में अपने पिता की साइकल की दूकान पर पंचर जोड़ता था। सन् 1942 को एक रोज उसने दो तिरंगे झंडे लिए, अपने थोड़े से दोस्तों को इकट्ठा किया और कस्बे के पोस्ट आफिस भवन पर पहुंच कर उस पर बलपूर्वक तिरंगा फहरा दिया। इस खतरनाक घटना से भीड़ जुट पड़ी। उधर पांचों लड़कों ने गढ़ाकोटा थाने का रुख किया जिसपर यूनियन जैक फहरा रहा था। थाने के भीतर पंक्तिबद्ध खड़े सिपाही अपने थानेदार का अभिवादन करने की रवायत निभा रहे थे। इतने में साबूलाल चार लड़कों के साथ थाने के भीतर घुस गया। उसके पीछे कंपाउंड के बाहर सैकड़ों की भीड़। जानकारों के मुताबिक साबूलाल ने थानेदार से ऊंची आवाज में कहा यूनियन जैक उतार कर फेको, यह तिरंगा थाने पर लगेगा और आप उसे सबके सामने सलामी देंगे। तेवर देख कर थानेदार चौंक गया। उसने जवानों को अलर्ट किया और दहाड़ कर चेतावनी दी , 'खबरदार कोई आगे बढ़ा सीधी गोली चलेगी'! साबूलाल उत्तेजित हो गया उसने तिरंगे का जयघोष किया और थाने की ध्वजवेदिका की तरफ बढ़ गया। पुलिस ने तुरंत लाठीचार्ज कर दिया। भीड़ भड़की तो गोलियां दाग दीं। साबूलाल को निशाना साध कर छाती पर गोली मारी गई। उसके एक साथी के हाथ पर गोली लगी। भीड़ तितरबितर हो गई। घायल साबूलाल को गाड़ी में लादकर सागर अस्पताल ले जाया गया लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। पुलिस उसकी लाश लेकर गढ़ाकोटा नहीं लौटी बल्कि उसके परिवार को सागर ले गई। सागर के नरयावली नाका श्मशानघाट पर सागर के कांग्रेसजनों और भारी जनसमूह के सामने साबूलाल का अंतिम संस्कार कर दिया गया। तभी इस मरघट के दरवाजे के बाजू में जहां साबूलाल की अर्थी रखी गई थी,उस स्थान को कांग्रेस कमेटी ने उसका स्मारक घोषित कर दिया। 50 साल बाद उसपर एक जयस्तंभ जैसा कुछ बना दिया गया। कुछ वर्षों तक 15 अगस्त स्वतंत्रता सेनानी वहां जुटते रहे लेकिन शनैः शनैः सेनानी स्वर्गवासी होते गए और कांग्रेसी भी इस कर्मकांड को भूल कर सत्ता के नशे में चूर हो गये। बिल्कुल बेमौसम यह कहानी बता रहा हूं आपको। सन् 1942 से लेकर आज तक हजारों अंत्येष्टियों में जैनसमुदाय के लोग निरंतर सागर के नरयावली श्मशानघाट जाते रहे हैं। मेरे देखे बीते तीस सालों में इनमें से एक ने भी साबूलाल के स्मारक पर फूल चढ़ाना तो दूर नजर तक नहीं डाली। जैनसमुदाय और कांग्रेस दोनों ही साबूलाल की शहादत का दिन तक विस्मृत कर चुके हैं। शहीद साबूलाल को ही क्यों। सागर में बैठ कर खुद को प्रदेश भर की जैनसमाज का ठेकेदार बताने वाले इन लोगों में से कितनों से उम्मीद की जाए कि वे जब साबूलाल को भूल गए हैं तो मंडला के शहीद विद्यार्थी उदयचंद्र जैन, दमोह के शहीद प्रेमचंद जैन आजाद, जबलपुर के शहीद मुलायम चंद जैन वल्द भैयालाल पुजारी , दमोह के ही भैयालाल चौधरी (जिन्हें कलकत्ता कांग्रेस से लौटते हुए ट्रेन में मारडाला गया) को ये याद भी रख पाएंगे !? कल सागर के कुछ जैनी एक बैठक में जुटे थे, उन्हें टिकट चाहिए है। क्यों चाहिए है , इसलिए कि दूसरी समाजें भी मांग रही हैं। अपनी समाज के शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम तक याद नहीं करने वाले कुछ लोग अपने नये-नये मुद्राकोष की गर्माहट से भरे हैं। उन्हें अपने अधिकार बखूबी याद हैं लेकिन कर्तव्य नहीं। इन्हें अपनी महत्वाकाक्षाओं और आडंबर की मिथ्याओं से प्यार है लेकिन अपनी समाज के शहीद और आजादी के लिए जेल जाने वाले परिवारों को बुलाकर उन्हें कभीकभार धन्यवाद देने की रस्म याद नहीं है। यहां नीचे एक किताब के कुछ पन्नों में दर्ज सागर जिले के 116 ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम मैं दे रहा हूं जो जैन थे। इनको गौर से पढिए और बताइए कि जैनसमाज के कुछ लोगों की कल की बैठक और पत्रकारवार्ता में शामिल एक भी व्यक्ति इन सेनानियों के परिवारों से था क्या?...यह भी बताइए कि क्या सूची में दर्ज लोग सिर्फ जैनसमाज की आजादी के लिए शहीद हो रहे थे या जेल जा रहे थे। ये क्या वे तत्व थे जो कालोनाइजर, बिल्डर्स, ठेकेदार या प्रापर्टी के कारोबार से कमाए धन की नींव पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते थे। तुम लोग जो न जाने किसके फतवे पर समाज की ठेकेदारी लेकर आए हो पहिले इस सूची में शामिल जैनपरिवारों के घरों से स्वीकृति लेकर आओ और समाज की अस्मिता का दावा करने लायक बनो। सच तो यह है कि आपमें से कई के दामन तो इतने पाक भी नहीं कि इन सेनानियों का स्मृति समारोह आयोजित...


भोपाल।
" टाइगर जिंदा है ".. टाइगर की आत्मकथा. नमस्कार प्रदेश वासियों हम कौन.. नाम तो सुना ही होगा.. बोले तो टाइगर.. घुर्र. घुर्र उमर 13 बरस 23 दिन .. यानि चौदहवें बरस का फुल्टूस घुटा हुआ टाइगर.. साल 2003 में एक गुस्सैल तेज तर्रार शेरनी और 2004 में एक बिना दांतों वाले शेर के राज के बाद जंगल में मेरी आमद हुई.. बचपन में हल्की फुल्की कद काठी के चलते जंगल के अन्य बड़े जानवर जैसे भालू, भेड़िया, लड़इया आदि ने मुझे भीगी बिल्ली समझा.. लेकिन मैं जंगल के कानून समझते हुए लोमड़ियों के साथ धीरे धीरे जंगल राज कायम करने में कामयाब हो गया.. एक तरफ मैंने जंगल के छोटे जानवरों पर प्यार बरसाया तो मुझे चुनौती देने वाले जानवरों का शिकार करने में कोई कोताही नहीं बरती .. समय के साथ लगातार दो पंचवर्षीय में मुझे ही जंगल का राजा चुना गया.. ऐसा नहीं है कि जंगल में सब कुछ शानदार था लेकिन जब भी मुझे ऊंची छलांग लगानी होती मैं दो कदम पीछे चला जाता.. इसी रणनीति के तहत जंगल में एकतरफा मेरा राज चला.. इसी बीच बगल के बड़े जंगल में शेर खान नाम के खूंखार बाघ ने दस्तक दी.. मेरे अपने कुनबे के भालू, बंदर, भेड़िया सब शेरखान के प्रभाव में आ गए और उसके सानिध्य में मेरे जंगलराज पर कब्जा करने का प्रयत्न करने लगे.. वे अपने लिए तो कुछ हासिल न कर पाए .. लेकिन मौका पाकर अन्य विरोधियों ने मुझसे मेरा जंगल और मेरा राज सब कुछ छीन लिया.. इसी बीच 13-14 बरस गुजर चुके थे.. अब यह टाइगर चुक चुका है.. जंगल के राजा से वन विहार के एक छोटे से बाड़े में कैद है.. कहने को तो इस बाड़े में पूर्व राजा की सारी सुख सुविधायें हैं.. लेकिन जंगल जंगल होता है साहब.. जितना यहां मेरा बाड़ा है उतना तो जंगल में मेरा बाथरूम हुआ करता था.. खैर,, अब यह मुझे भी मालूम है कि मेरा दोबारा जंगल का राजा बनना मुश्किल है.. लेकिन बीते 13-14 सालों में मेरे अंदर जो राजापना रच बस गया है, सुबह शाम लोमड़ियों की जी हुजूरी की आदत लग गई है उससे कैसे पीछा छुड़ाऊं... सो एक नया तरीका निकाला है.. आजकल मैं हिरन ,, यानि ए कॉमन एनिमल ऑफ जंगल के भेष में निकलता हूँ.. ताकि आम जंगल प्राणियों के बीच रच बस सकूं, उन लोमड़ियों की पहचान कर सकूं जो मेरा राज जाते ही विरोधियों से मिल गए.. दिल से बताऊं तो मुझे भी पता है कि मेरी वापसी फिर से मेरे जंगल में शायद संभव न हो ..लेकिन अगर इस वन विहार के बाड़े को यूं चुपचाप स्वीकार कर लिया तो फिर मेरे ही पूर्व साथी जानवर मुझे सर्कस भेजने में देर न करेंगे.. इसीलिए बुरे वक्त में खुद को समझाने और सबको भभकी देने के लिए ही कभी कभी शीशे के सामने घुर्रा देता हूँ और अपनी ही परछाई से कह देता हूँ.. कि.. "टाइगर जिंदा है "...


शिवपुरी।
एक सच्चा लोकतंत्र सेनानी - आपातकाल रहा हो अथवा आपातकाल के बाद, हमारी मित्र मंडली के अहम सदस्य हैं श्री विमलेश गोयल | मैंने आजतक उन जैसा निस्वार्थ, हंसमुख, उत्साही और परदुखकातर व्यक्ति नहीं देखा | अपनों के लिए सर्वस्व अर्पण को तैयार | जितने दौलामौला हैं, उतने ही नए नए सुरुचिपूर्ण वस्त्र पहनने और सुस्वादु भोजन के बेहद शौकीन | स्वाभाविक ही यह श्रेष्ठि वंश परंपरा का प्रभाव है, वे शिवपुरी के मशहूर सराफा व्यवसाई परिवार में उत्पन्न हुए | आपातकाल के दौरान हम दोनों को संयुक्त रूप से भूमिगत सत्याग्रह के संचालन का दायित्व सोंपा गया था | 25 दिसम्बर 1975 का वह दिन मैं नहीं भूल पाता | हम लोग सईसपुरा के एक मकान में तीन दिन से भूखे प्यासे छुपे हुए थे | विमलेश जी परेशान होकर मेरे मना करने के बाबजूद कमरे से निकले कि ए.बी.रोड के उस पार स्थित पापा पंजाबी होटल से दोनों के लिए कुछ खाद्य सामग्री ले आता हूँ | लेकिन एक ऐसे पुलिस कांस्टेबिल ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया जो परिवार के सदस्य जैसा था और वे मीसाबंदी के रूप में ग्वालियर सेन्ट्रल जेल भेज दिए गए | पर आज के इस लेखन का उद्देश्य इस घटना से भी बड़ी एक घटना की जानकारी देना है, जो विमलेश जी के जीवट और उनकी महानता को दर्शाती है | बात उन दिनों की है जब रामजन्मभूमि आन्दोलन चल रहा था | मुलायमसिंह सरकार ने म.प्र. से आने वाले सभी रास्ते बंद करवा दिए थे | सडकों पर खाईयां खोद दी गई थीं | किन्तु यह आस्था का ज्वार था | कारसेवक सब वाधाएं पार करते अयोध्या की तरफ बढ़ते जा रहे थे | स्थान स्थान पर चेकिंग के दौरान अनेकों लोग उ.प्र. की सीमा में गिरफ्तार भी हो रहे थे | शिवपुरी से गए कारसेवकों का एक जत्था भी पकड़ा गया और उन लोगों को उन्नाव जेल में बंद कर दिया गया | उत्साही कारसेवकों के “जय श्री राम” के नारों से पूरी जेल गूँज उठी | जेल अधिकारियों की शह पर दुर्दांत मुस्लिम कैदियों ने इन कारसेवकों पर आक्रमण कर दिया | मेस में काम आने वाले लोहे के पलटों से उन्होंने कारसेवकों के साथ मारपीट शुरू कर दी | जब उन्हें जमीन पर पटक कर पीटा जा रहा था तब शिवपुरी के एक कारसेवक को बचाने विमलेश जी उसके ऊपर लेट गए और प्रहार अपने ऊपर झेलने लगे | मुस्लिम कैदियों को समझ में आ गया कि यही वास्तविक नेता है | फिर क्या था सबको छोड़कर वे लोग इन पर टूट पड़े | फिर तो विमलेश जी को मृत समझ कर ही छोड़ा गया | इधर कारसेवकों पर स्थान स्थान पर हो रही कार्यवाही के साथ साथ अशोक जी सिंघल के घायल होने का समाचार भी पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैला | शिवपुरी वासियों ने अभूतपूर्व बंद का आयोजन किया | शिवपुरी से गए कारसेवकों की सलामती हेतु प्रार्थना करने के लिए दोपहर 12 बजे स्थानीय हनुमान मंदिर में बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए | इतनी भाव प्रवण प्रार्थना सभा मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी | लोग सच्चे ह्रदय से अश्रुपूरित नेत्रों और रुंधे कंठों से अपने आत्मीय स्वजनों की सुरक्षा के लिए प्रभु से गुहार लगा रहे थे | “श्री राम जय राम जय जय राम” की धुन से वातावरण वर्णनातीत आध्यात्मिक हो गया था | उन्नाव में विमलेश जी सात दिन तक मूर्छित अवस्था में अस्पताल में रहे, उसके बाद कहीं जाकर वे होश में आये | उन्हें एक माह अस्पताल में ही रहना पडा | मेरा मानना है कि उस दिन धर्मसभा में की गई प्रार्थना का ही परिणाम है कि विमलेश जी सकुशल हमारे बीच वापस आये | आपको क्या लगता है ? चित्र में शिवपुरी के चार पूर्व मीसाबंदी - बाएं से दायें श्री विमलेश गोयल, मैं स्वयं, श्री गोपाल कृष्ण डंडौतिया और पीछे खड़े हुए श्री गोपाल सिंघल |...


ग्वालियर।
झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ? वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी. अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली. 1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे. आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं – 15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ. ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा. ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई. तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया. गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे. मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए. मगर ऐसा नहीं हुआ. डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा. मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी. इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी. मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा. इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे. फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा. मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली. मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था. मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं. इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे. नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई. 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े. हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था. किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली. मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे. शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई. असल दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई. घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया. किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली. रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे. मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की. हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी. देखते-देखते दो साल निकल गए. ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे. मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा. मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें. मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया. मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे. उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए. वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए. ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया. वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया. मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया. वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे. हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया. मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की. उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है. रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है. बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं. इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा. फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की. वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए. हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था. सफर का खर्च...


बस्तर -छ।
अब हिंसा व अराजकता फैलाकर देश तोङने का कोई मंसूबा सफल नही हो सकता--आइए सुनिए नक्सल के खात्मे की सच्ची कहानी... 'सिविक एक्शन प्रोग्राम' _________________ फौज के सन्दर्भ में इस शब्द की सामान्य परिभाषा यही है कि यह फौज और उस इलाके में रह रहे जनसामान्य के बीच कुछ विशेष कार्यक्रमों के तहत उन्हें बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराकर फौज और पब्लिक के बीच एक सेतु का निर्माण करता है,ताकि मौजूद जनसमूह का फौज से एक स्वस्थ संबंध निर्मित हो और उन्हें लगे कि फौज की उपस्थिति उनके लिये हितकर है और परिणामस्वरूप अलगाववादी इंसरजेंट्स की 'ब्रेन वाशिंग पॉलिसी' को तोड़कर जनसमूह का सबसे पहले तो फौज के प्रति विश्वास बढ़ता है और कानून-व्यवस्था ,संविधान और लोकतंत्र के प्रति उनके सम्मान में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन फौज शांत इलाकों में भी स्वयं के प्रति पूर्व निर्मित नकारात्मक मानसिकता को तोड़ने हेतु संचालित करती रहती है, किंतु अगर बस्तर जैसे अति संवेदनशील और नक्सलग्रस्त इलाकों की बात करूं तो इस कार्यक्रम की महत्ता काफी अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि यह व्यक्ति नहीं बल्कि विचार के समूल समापन की भावना से प्रेरित है और इसके परिणाम त्वरित तो होते ही हैं और प्रभाव भी काफी दूरगामी होता है। अपनी बेसिक ट्रेनिंग की समाप्ति के उपरांत मुझे सबसे पहली पोस्टिंग ही बस्तर के किसी कुख्यात नक्सली क्षेत्र में मिली। इस जगह पर प्रारंभ से ही मैंने नक्सल समस्या को जड़ से देखा और समझा। इस इलाके में सबसे पहले मैंने यही बात नोटिस की थी कि किस प्रकार से सुदूर ग्रामीण इलाकों में अशिक्षित और समाज की मुख्य धारा से दूर जी रहे आदिवासी समुदाय को भय और दबाव के साथ नक्सली खुद से जोड़ते हैं और ब्रेन वाश करके कालांतर में एक दुर्दांत नक्सली बनाते हैं। यह दौर मेरे लिये काफी नया था और बहुत सी चीजें वास्तव में काफी अचंभित करती थी। मेरे या मेरे यूनिट के लिये 'सिविक एक्शन प्रोग्राम' कोई नयी बात नहीं थी, किंतु यह हमारी रणनीति का मुख्य हिस्सा बना वर्तमान कमांडेंट सर के यूनिट में आगमन के उपरांत। पहली परिचालनिक मीटिंग में ही सभी अधिकारियों के समक्ष उन्हौनें यही कहा था कि, "नक्सलवाद एक रक्तबीज की तरह है जिसमें एक की समाप्ति दस और नक्सल पैदा करती है। अगर वाकई में नक्सलवाद की समाप्ति के प्रति प्रतिबद्ध हो तो उनके उस विचार को मार दो जो आदिवासियों को सरकारी प्रयासों और फौज के प्रति विद्रोही बनाकर लोकतंत्र के लिये एक खतरा बनाती है।" और यहीं से 'एन्टी नक्सल ऑपरेशन' के साथ-साथ 'सिविक एक्शन प्रोग्राम' हमारी रणनीति का एक मुख्य हिस्सा बना और परिणाम बेहतर से भी कहीं अधिक बेहतरीन रहा। कैम्प के आसापास के इलाकों के साथ-साथ दूर-दराज के इलाकों तक को चिह्नित किया गया और शुरू हुआ फौज और पब्लिक के बीच एक बेहतरीन रिश्तों का दौर ,जिसमें हर सोल्जर उन्हें खुद का रक्षक लगता था। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये स्कूलों में स्कूल ड्रेस,बेग,किताबें,खेल-कूद के सामान और यहां तक कि कम्प्यूटर तक का वितरण किया गया।इतना ही नहीं,बल्कि समय-समय पर अधिकारियों ने स्कूली बच्चों के साथ समय बिताकर उन्हें एक बेहतरीन भविष्य का रास्ता दिखाया। उन्हें बताया कि उनके हाथ डेमोक्रेसी के विरुद्ध हथियार उठाने के लिये नहीं बल्कि कलम पकड़कर खुद के साथ-साथ देश के भविष्य को बेहतर बनाने के लिये हैं,जिसका परिणाम एक बड़े से इलाके में शिक्षा के प्रति बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों तक की बढ़ी जागरूकता के रूप में देखने को मिली। स्वास्थ्य की वो सुविधायें जो जिला मुख्यालय या तहसील से दूर रह रहे आदिवासी नहीं उठा पाते थे, वहां भी सी आर पी एफ के चिकित्सक पहुंचे और टेली मेडिसिन केम्प का आयोजन कर करके उन्हें स्वास्थ्य की भरपूर सुविधाओं को प्रदान किया गया। कई गम्भीर बीमारियों को भी महज रणनीति का हिस्सा ना मानते हुये उन क्षेत्रों से लोगों को बाहर ले जाकर बड़े शहरों में सुविधायें उपलब्ध करायी गयीं। यह सब हमारी भूमिका को रक्षक के रूप में पुष्ट करने में सफल हुआ और लोगों के बढ़ रहे विश्वास ने नक्सलियों में खलबली मचा दी। युवा वर्ग में फौज के प्रति अच्छी भावना को विकसित कराने हेतु उन्हें छोटे-छोटे रोजगारों से जोड़ा गया,आर्थिक मदद मुहैया कराई गयी,खेल-कूद के कार्यक्रमों के जरिये एक 'स्पोर्ट्स-स्पिरिट' को पैदा किया गया। चाहे नक्सलियों के द्वारा अपने बेटे को नक्सल केम्प भेजने से इंकार करने पर व्यक्ति के पैर काट दिये जाने वाली घटना के काफी बाद उसे कृत्रिम पैर लगवाना हो, साफ पानी की समस्या से जूझ रहे गाँव में बो...