प्रयागराज।
कल 16 दिसंबर को प्रधानमंत्री प्रयागराज जा रहे हैं।आज उसके पसले 71 देशों के प्रतिनिधियों का आज आगमन है ,जिसकी तैयारियां पूरी हो गयी हैं ।शहर मे सङको पर बच्चे व लोग खङे होकर स्वागत क रेंगे तथा सारे मेहमान संगम जाएंगे व पांच घंटे तक वहां रहकर कुंभ की भव्यता एवं विशिष्टता को हृदयंगम करेंगे।इस तरह से प्रयागराज से दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश दिये जाने की पूरी शिद्दत से कोशिश है।इसके बाद कल जब पीएम आएंगे तो गंगा पूजन होगा तथा गंगा आरती का भी भव्य कार्यक्रम संपन्न होगा।कुंभ की सफलता क लिए आराधना व पूजा की जाएगी। प्रधानमंत्री के आगमन को देखते हुए शासन प्रशासन कमर कसकर तैयारियो मे लगा है।अभेद सुरक्षा व्यवस्था बनायी जा रही तथा पूरे आयोजन को व्यापक स्वरूप दिया गया है।इसको देखते हुए प्रयागराज मे भारी हलचल व तेजी मच गयी है।सब लोग बङी उत्सुकता से कल की प्रतीक्षा मे हैं।सबको भरोसा है कि इस बार का कुंभ मेला काफी खास रहेगा।...


वाराणसी/काशी।
-नम आँखों से काशी की गलियों में घूमे गोविंदाचार्य -सुने, भावुक हुए, पर बोले कुछ नहीं -देवताओं की रक्षा करने वालों पर मंदिर कब्जाने का आरोप झूठा है- गोविंदाचार्य -क्या भगवान विश्वकर्मा के हाथों रची काशी को उनसे भी ज्यादा सुन्दर बनाने वाला कोई नया विश्वकर्मा का अवतार आ गया है - गोविंदाचार्य -आज के निर्माणकर्ता सिर्फ अभियंता हैं कलाकार नहीं-गोविंदाचार्य वाराणसी,4 दिसम्बर। आज सुबह लगभग सवा दस बजे अचानक गोविंदाचार्य काशी विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र में चल रहे कॉरिडोर का काम देखने पहुंचे । कल सोमवार को एक मित्र के यहाँ निजी कार्यक्रम में आये तो शाम को कुछ लोगों से बातचीत करते हुए विश्वनाथ कॉरिडोर का काम देखने की इच्छा व्यक्त की। उसी क्रम में वे आज पक्के महाल के लाहौरी टोला, नीलकंठ, मणिकर्णिका घाट, विश्वनाथ गली, सरस्वती फाटक क्षेत्र में लगभग सवा घंटे तक घूमते रहे। विश्वनाथ द्वार से पत्रकार राजनाथ तिवारी और समाजसेवी त्रिलोचन शास्त्री के साथ जब गोविंदाचार्य लाहौरी टोला पहुंचे तो अवाक् हो देखते रहे। थोड़ी दूर ललिता घाट की ओर बढ़े तो पूर्व में पंडित कमलापति त्रिपाठी की कोठी के सामने रमन जी के मकान के सामने पहुँच भावुक हो गए। वहीँ पुराने शाखा के सहयोगी कृष्ण कुमार शर्मा ने एक घर की ओर इशारा कर बताया ये रमन जी का मकान है अब जमींदोज हो गया है। इसी मकान में गोविन्दाचार्य ने सहयोगियों के साथ अनेकों बार जलपान किया था। तब वहां विश्वेश्वर शाखा लगती थी। यहाँ एक जर्मन महिला मिली। शास्त्री जी ने बताया इनको मानसिक आघात हुआ है इस योजना से। कभी वैद्य लालबिहारी शास्त्री के यहाँ किडनी फेल होने पर इलाज के लिए आयीं तो फिर बनारस की होकर ही रह गईं। बनारस के गलियों के सौंदर्य ने मन मोहा तो फिर गलियां ही इनका घर बन गईं । लेकिन, कॉरिडोर योजना में मकानों को टूटता देख इन्हें आघात लगा है और ये जब बोलना शुरू करती हैं तो बिना रुके घंटों अपनी पीड़ा व्यक्त करती हैं। आगे सीढ़ियों से उतर कर गोयनका लाइब्रेरी की ओर बढ़े तो सीढ़ियों पर जैन तीर्थंकर की मूर्ती, गोस्वामी तुलसी दास जी को काशी आने पर सबसे पहले जहाँ हनुमान जी के दर्शन हुए थे उन मंदिरों को देख कर शायद वो इतने भावुक हो गए कि उनकी आँखें नम हो गईं। लोगों ने बताया कि हमारे ऊपर इल्ज़ाम लगाया जा रहा है कि हमने मंदिरों पर कब्ज़ा कर लिया है। गोविंदाचार्य ने कहा लेकिन कोई सरकार अपने ही नागरिकों पर ऐसा घृणित आरोप कैसे लगा सकती है। क्या सरकार को यह इतिहास पता है कि काशी के लोगों ने लगभग 300 सौ वर्षों तक आक्रांताओं के कोप से बचाने के लिए देवताओं को घरों में रख लिया या मंदिरों के चारों ओर ऐसा निर्माण कर दिया कि आक्रांता उसे देख न सकें। लेकिन कभी भी क्या यहाँ के नागरिकों ने किसी देवता का भोग, आरती और पूजा रोकी। सरकार को धर्म और संस्कृति के प्रति यहाँ के नागरिकों की निष्ठा और पवित्र भावना नहीं दिखती। बातचीत में उन्होंने कहा कि कोई सरकार विकास के नाम पर धर्म की रक्षा करने वालों को ही कैसे प्रताड़ित कर सकती है । गोयनका गली के पीछे मणिकर्णिका चौमुहानी से विश्वनाथ मंदिर की ओर सीढियाँ चढ़ते मंदिरों का सौंदर्य और उनके चहुंओर हो रहे विप्लव को देख कर बोले क्या आज के अभियंता भगवान विश्वकर्मा से भी ज्यादा कुशल कारीगर हैं। जिनके बारे में हमने हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगीत में वर्षों पढ़ा..नए नहीं हैं ये ईंट पत्थर है विश्वकर्मा का कार्य सुन्दर, बसी है गंगा के रम्य तट पर यह सर्व विद्या की राजधानी। उन्होंने पूछा कि क्या कोई नया विश्वकर्मा भगवान आ गया है जो उनसे सुन्दर काशी की रचना करने जा रहे हैं। नीलकंठ से विश्वनाथ मंदिर पहुँच कर उनके पैर रुक गए मंदिर परिसर और सामने की तरफ वीरान हो चुके भवनों के अवशेष, उजड़े मकानों और सौन्दर्यपूर्ण सर्पीली गलियों की जगह समतल मैदान देख कर वह कुछ बोल नहीं पाए, बबलू, कृष्ण कुमार शर्मा और स्थानीय लोग जो सुनाते रहे चुप चाप सुनते रहे । इस दौरान अनेक बार उनके हाथों की उंगलियां उनके आँखों के कोरों को पोंछती रही। और फिर बिना कुछ बोले चुपचाप भगवान विश्वनाथ को प्रणाम कर चले गए। इस दौरान पूरे समय उनके सहयोगी बृजेश सिंह मौजूद रहे।...


इलाहाबाद ।
सन 1866 में इलाहाबाद में Muir College के नाम से स्थापित हुये गौरवशाली शिक्षा स्थल को 23 सितंबर, 1887 को जैसे ही विश्विद्यालय घोषित किया गया वो कलकत्ता, बम्बई और मद्रास के बाद इस देश का चौथा विश्वविद्यालय बन गया। "QUOT RAMI TOT ARBORES" जिसका सूत्र वाक्य बना जिसका अर्थ है "जितनी शाखायें उतने पेड़" जो आजतक इलाहाबाद विश्विद्यालय का मोनोग्राम बना हुआ है, उस वैभवशाली इलाहाबाद विश्विद्यालय का आज 131वां स्थापना दिवस है। बीते 131 वर्षों में इस विश्विद्यालय ने प्रधानमंत्री तो छोड़िये कितने राजनेता, साहित्यकार, वैज्ञानिक, जस्टिस और ब्यूरोक्रेट दिये हैं इसकी कोई गिनती नहीं है और न ही कोई मुकाबला। समाज का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ अपने इस गौरवशाली विश्विद्यालय के छात्रों ने अपनी काबलियत और मेधा के झंडे ना गाड़े हों। नाम लिखने बैठें तो जगह कम पड़ जायेगी लेकिन लिस्ट फिर भी अधूरी रह जायेगी। इस इलाहाबाद शहर के मिजाज का अंदाज आप इसी बात से लगा लीजिये कि इसे जब पंत, महादेवी, निराला और फिराक के शहर के नाम से जाना जाता है तो उसी क्रम में इसे बच्चन का शहर कहा जाता है और बाहर वालों के लिये बच्चन का मतलब भले ही अमिताभ बच्चन से हो लेकिन इलाहाबाद वालों के लिये आज भी ये शहर हरिवंश राय बच्चन का ही शहर है....ये है तासीर हमारे विश्विद्यालय की। निजी तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय है कि मैं पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इस विश्विद्यालय का छात्र रहा हूँ। राजनीति, साहित्य, दर्शन, मनोविज्ञान और विज्ञान जहाँ के कण कण में बसता है ऐसे इलाहाबाद विश्विद्यालय के 131वें स्थापना दिवस की अपने विश्विद्यालय के सभी शिक्षकों, अग्रजों, मित्रों और अनुजों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !! धर्मवीर भारती के गुनाहों के देवताओं के इस शहर के हर बाशिंदे को गर्व है कि उसके पास एक ऐसा विश्वविद्यालय है जैसा किसी दूसरे शहर के पास नहीं है। हमारा विश्विद्यालय और यशस्वी हो यही मंगलकामनाएं !!...


इटावा/भिंड-मुँरैना ।
नीरज और डाकू मान सिंह! यह क़िस्सा हमारे किस्सागो दोस्त श्री अशोक बंसल (Ashok Bansal) ने सुनाया है। सच-झूठ वही जानें। फ़िलहाल वे मेलबॉर्न में बच्चों के पास हैं। तो सुनिए क़िस्सा- “गीतों के राजकुमार नीरज के न रहने की खबर से मैं अनमना सा हो गया हूँ. मेलबोर्न में समुद्र किनारे मेरी नजरें बनती मिटटी लहरों पर जरूर हैं पर जेहन में उनके दो किस्से अचानक उभर आये हैं . फिरोजाबाद में एक कवि सम्मेलन में आये थे ५० साल पहले . मैं बालक था . मेरे घर रात्रि विश्राम किया था . जाते वक्त अपने साथ लाये एक तकिये को भूल गए . सेंवल की रूई का गुदगुदा तकिया घर के सभी बच्चो का भाया . तकिये पर खूब छीना झपटी हुई . तकिये की रूई निकल पड़ी और घर में बिखर -बिखर गई. मुझे लगता है कि यह रूई नहीं नीरज की काव्य प्रतिभा की खुश्बू थी जिससे मेरे घर में साहित्य प्रेम का वातावरण आज भी महक महक रहा है . किस्सा एकदम छोटा सा है लेकिन मेरे मानस में आज ५० साल से अंकित है . क्यों न हो तकिया नीरज का जो था. दूसरा किस्सा कविता की अकूत ताकत का है. इस ताकत को दर्शाने वाले अनेक किस्सों से काव्य प्रेमी वाकिफ हैं लेकिन गीतों के राजकुमार नीरज से जुड़े एक मजेदार किस्से को सुनाने को मेरा मन मचल रहा है . नीरज अपने कवि मित्रों के साथ मुरैना में एक कवि सम्मलेन में काव्यपाठ कर स्टेशन की ओर आ रहे थे . इन मित्रों में आगरा विवि में समाज शास्त्र के प्रोफ़ेसर स्व डा . राजेश्वर प्रसाद सक्सेना भी थे . रेलवे स्टेशन आता इससे पूर्व कुछ हथियारबंद लोगों ने कवियों का रास्ता रोका और अपने साथ चलने का आदेश दिया . निहथ्थे कवि बंदूकधारियों के पीछे हो लिए . भिंड- मुरैना डकैतों का इलाका माना जाता है . कवि समझ गए कि उनका अपहरण हुआ है. बीहड़ों में चलते चलते उन्हें ऐसे स्थल पर ले जाया गया जहाँ कई अन्य डकैत पहले से मौजूद थे. उनमें से डकैतों के सरदार ने नीरज की ओर मुखातिब हो पूछा --'' क्या करते हो ?'' नीरज बोले ---कविता पढ़ते हैं कवि सम्मलेन में . '' सरदार बोला----'' भजन सुनाओ '' नीरज ने अपने मुक्त कंठ से यह भजन सुनाया --- ''प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो | समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करो || एक लोहा पूजा मे राखत, एक घर बधिक परो | सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो || यह सरदार कोई और नहीं दस्यु सम्राट मान सिंह था . भजन सुन मानसिंह के नेत्रों से पानी की बूँदें छलकती कवियों ने देखीं. मानसिंह ने कवियों की खूब आवभगत की और सम्मान पूर्वक उन्हें रेलवे स्टेशन तक छुड़वाया. ( मानसिंह ने कोई दक्षिणा कवियों को दी या नहीं.?) प्रो. राजेशवर प्रसाद के मुख से यह रोमांचक किस्सा मैंने कई बार सुना था . दस्यु मानसिंह पर १११२ डाके , १८५ हत्या जिनमे ३२ पुलिसकर्मी शामिल थे , आदि का आरोप था . नीरज की उम्र तब ३० के आसपास रही होगी . इस घटना के बहुत दिनों तक नीरज के मित्र चुटकी लेते थे ---'' जो कवि अपनी कविता से मानसिंह जैसे डकैत को लूट सकते हैं उन्हें कौन लूट सकता है?'' संतोष की बात यह है कि कवि नीरज को अपने जीवन काल में अपनी प्रतिभा के बदले खूब शोहरत मिली ,सम्मान - प्यार मिला . अब तो हिंदी प्रेमियों को उनका श्राध्द उनके गीतों को गाकर - गुनगुनाकर और उनके किस्से सुनाकर साल में एकबार नहीं , बार बार कर करते रहना है.”...


इलाहाबाद।
तश्वीर खुद ही सब कहती है।खबर मे सिरफ एक फोटो है ।यह फोटो है सर्किट हाउस इलाहाबाद के सूट नं 5 गंगा का जिसमे आज प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री रूके है।सबकी मीटिंग करने आए है। फिलहाल संगठन मंत्री जी अंदर मौजूद है,और बताया गया है कि अंदर खास गुप्तगू चल रही है।बाहर कार्यकर्ता मिलने के लिए इंतजार करते मौजूद है।दिन के एक बजे है।कमरे मे बाहर से ताला लगवा दिया गया है ।खङा सिपाही तश्वीर मे दिख रहा ही है।कुछ दिख नही रही है तो वह दरवाजे के सामने घंटो से खङे मौजूद कार्यकर्ताओ की पीङा ,उपेक्षा और निराशा।...